एक पागल की हँसी —
वह आदमी चौराहे के किनारे बैठा रहता था।
उसका कोई निश्चित समय नहीं था आने का, और शायद कोई निश्चित कारण भी नहीं था रहने का।
लोग उसे “पागल” कहते थे, पर वह इस शब्द को ऐसे देखता था जैसे वह उसके लिए नहीं बना हो। वह जवाब नहीं देता था — वह बस हँस देता था।
उसकी हँसी किसी स्थिति पर नहीं आती थी, वह जैसे पहले से ही मौजूद रहती थी।
कभी हवा में, कभी धूल में, कभी उन चेहरों के पीछे जो उसे देखकर तेज़ी से आगे निकल जाते थे।
कई बार लगता था कि वह किसी को देख रहा है। पर वहाँ कोई नहीं होता था। फिर भी उसकी हँसी ठीक उसी जगह से शुरू होती थी जहाँ “कोई नहीं” होता है।
बारिश के दिनों में उसकी उपस्थिति बदल जाती थी। वह भीगता नहीं था — जैसे पानी उसके शरीर से नहीं, किसी और परत से गुजरता हो। उस समय उसकी हँसी थोड़ी धीमी हो जाती थी, लेकिन अधिक गहरी लगती थी।
लोग कहते थे कि वह कुछ भूल गया है।
लेकिन यह भी कहा जा सकता था कि उसने कुछ ऐसा याद कर लिया है जिसे बाकी लोग भूल चुके हैं।
एक दिन वह चौराहे पर नहीं था।
न कोई भीड़ बदली, न कोई रास्ता। सब कुछ पहले जैसा ही रहा।
सिर्फ़ एक अंतर था
जहाँ पहले उसकी हँसी हवा में रुकती थी, वहाँ अब एक खालीपन था जो उतनी ही देर तक टिकता था।
धीरे-धीरे लोगों को समझ में आया कि वह चला गया है।
पर यह समझ भी पूरी नहीं थी।
क्योंकि कभी-कभी, जब भीड़ थोड़ी देर के लिए रुकती है,
तो ऐसा लगता है — जैसे किसी ने बहुत हल्के स्वर में हँसना शुरू किया हो,
और फिर खुद ही उसे सुनकर चुप हो गया हो।
मुकेश ,,,,,,,
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