समय की सीढ़ियों पर कोई लौटता नहीं
समय की एक पुरानी सीढ़ी है,
पत्थर की,
घिसी हुई,
जिस पर अनगिनत क़दमों की थकान जमी है।
मैं उस पर चढ़ रहा था
धीरे-धीरे,
जैसे हर पायदान
मुझसे कुछ छीनता जा रहा हो।
ऊपर
कोई शोर नहीं था,
सिर्फ़ हवा थी
जो बीते हुए दिनों की तरह
चेहरे को छूकर निकल जाती थी।
मैंने नीचे झाँका
तो बहुत-से लोग दिखाई दिए—
कुछ जिन्हें मैंने चाहा था,
कुछ जिन्होंने मुझे छोड़ दिया,
और कुछ
जो शायद कभी सचमुच मेरे थे ही नहीं।
मैंने सोचा
अगर वापस उतर जाऊँ
तो क्या सब फिर वैसा हो जाएगा?
मगर तभी
सीढ़ियों ने बहुत धीमे से कहा—
“समय ऊपर ले जाता है,
वापस नहीं।”
मैं रुक गया।
पहली बार समझ आया
कि स्मृतियाँ
घर नहीं होतीं,
सिर्फ़ खिड़कियाँ होती हैं
जिनसे हम
गुज़रे हुए जीवन को देखते रहते हैं।
फिर मैंने
पीछे देखना छोड़ दिया।
और जब आख़िरी पायदान पर पहुँचा,
तो पाया—
ऊपर कोई मंज़िल नहीं थी,
सिर्फ़ एक खुला आकाश था
और मैं,
पहले से थोड़ा हल्का।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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