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Monday, 11 May 2026

आईनों में कोई गहराई नहीं होती

 आईनों में कोई गहराई नहीं होती


आईनों का एक कमरा है,

लंबा, ठंडा,

अनगिनत चेहरों से भरा हुआ।

मैं उसमें दाख़िल हुआ

तो हर तरफ़

अपना ही अक्स दिखाई दिया।

एक हँसता हुआ,

एक थका हुआ,

एक ऐसा

जो शायद कभी सचमुच मेरा था ही नहीं।

मैंने एक आईने को छुआ,

उसकी सतह ठंडी थी

बिलकुल वैसी

जैसी अधूरी मोहब्बत के बाद

दिल हो जाता है।

वहाँ

हर चेहरा साफ़ दिखता था,

पर कोई भी

भीतर तक नहीं उतरता था।

तब समझ आया,

आईना सिर्फ़ शक्ल लौटाता है,

सच नहीं।

सच तो शायद

उन दरारों में छिपा होता है

जहाँ आदमी

ख़ुद से नज़रें चुराता है।

मैं देर तक

अपने ही अक्सों के बीच खड़ा रहा,

और सोचता रहा

कितनी उम्र बीत जाती है

दूसरों को दिखने वाला चेहरा बनाने में,

और भीतर का आदमी

चुपचाप

अदृश्य होता जाता है।

फिर मैंने

एक-एक करके

सारे आईनों से नज़र हटा ली।

क्योंकि

कुछ यात्राओं में

ख़ुद को देखने के लिए

अक्स नहीं,

अँधेरा चाहिए होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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