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Monday, 11 May 2026

धुँध में कोई रास्ता नहीं होता

 धुँध में कोई रास्ता नहीं होता


धुँध का एक मैदान है,

बहुत सफ़ेद,

बहुत ख़ामोश,

जहाँ दूर तक

कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता।


मैं वहाँ चला

तो अपने क़दमों की आवाज़ भी

धीरे-धीरे खोने लगी।


अजीब था—

रास्ता मौजूद था,

पर दिखता नहीं था।


मैंने पीछे मुड़कर देखा,

तो अपने ही निशान

धुँध ने मिटा दिए थे।


जैसे अतीत

कभी था ही नहीं।


थोड़ी देर बाद

मुझे डर लगने लगा—

उन चीज़ों से नहीं

जो वहाँ थीं,

बल्कि उनसे

जो दिखाई नहीं दे रही थीं।


फिर भीतर कहीं

एक बहुत धीमी आवाज़ उठी


“हर रास्ता

देखकर नहीं चला जाता,

कुछ रास्ते

सिर्फ़ भरोसे से पार होते हैं।”


मैं रुक गया।

पहली बार

मैंने मंज़िल के बारे में सोचना छोड़ा

और बस

चलते रहने को स्वीकार किया।


धीरे-धीरे

धुँध अब दुश्मन नहीं रही,

वह एक परदा बन गई

जिसके पीछे

दुनिया का शोर छूटता जाता था।


जब मैं उस मैदान से बाहर निकला,

तो धूप पहले जैसी ही थी,

पेड़ भी वही थे,

आसमान भी।


बस एक चीज़ बदल गई थी

अब मुझे

हर साफ़ दिखाई देने वाली चीज़ पर

पहले जैसा यक़ीन नहीं रहा।


मुकेश ,,,,,,,

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