ख़ामोशी का कोई चेहरा नहीं होता”
ख़ामोशी का एक शहर है,
बहुत दूर,
जहाँ आवाज़ें
अपने अर्थ उतारकर चलती हैं।
मैं वहाँ पहुँचा
तो सबसे पहले
अपना नाम पुकारा,
मगर किसी ने
मुड़कर नहीं देखा।
जैसे नाम
सिर्फ़ दुनिया की ज़रूरत हो,
रूह की नहीं।
वहाँ
चेहरों पर कोई भाव नहीं था,
न उदासी,
न मुस्कुराहट,
सिर्फ़ एक शांत उपस्थिति
जो भीतर तक उतरती थी।
मैंने एक बूढ़े दरख़्त से पूछा
“यह कैसी जगह है
जहाँ कोई बोलता नहीं?”
उसने पत्तों की हल्की कंपन से कहा,
“जहाँ सत्य जागता है,
वहाँ शब्द
धीरे-धीरे मर जाते हैं।”
फिर मैंने देखा,
मेरे भीतर कितनी आवाज़ें थीं
डर की,
इच्छाओं की,
यादों की,
और उन सबके पीछे
एक गहरी ख़ामोशी
सदियों से बैठी थी।
मैं देर तक
उसी ख़ामोशी के पास बैठा रहा,
बिना कुछ सोचे,
बिना कुछ माँगे।
और जब लौटा
तो लोगों ने कहा
“तुम पहले जैसे नहीं रहे।”
मैं मुस्कुरा दिया,
क्योंकि
कुछ यात्राएँ इंसान को बदलती नहीं,
सिर्फ़ उसके भीतर का शोर
कम कर देती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,
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