प्लेटफ़ॉर्म : छठी नज़्म — वेटिंग रूम
वेटिंग रूम में
समय
घड़ी से नहीं,
इंतज़ार से चलता था।
लोहे की पुरानी कुर्सियाँ,
दीवारों पर उतरता हुआ रंग,
और छत का पंखा
जो बरसों से
एक ही थकान में घूम रहा था।
यहाँ
हर आदमी
कुछ देर के लिए
अपने सफ़र से बाहर आ जाता था।
कोई अख़बार पढ़ते-पढ़ते सो गया था,
कोई मोबाइल चार्ज करते हुए
बार-बार स्क्रीन देख रहा था,
एक औरत
अपने बच्चे को गोद में लिए
धीरे-धीरे थपक रही थी।
कोने में रखा पानी का कूलर
लगातार गुनगुनाता रहता,
जैसे उसे भी
किसी ट्रेन का इंतज़ार हो।
एक बूढ़ा आदमी
अपना टिकट
बार-बार जेब से निकालकर देखता,
फिर वापस रख देता—
जैसे डरता हो
कि कहीं सफ़र
सिर्फ़ सपना न रह जाए।
रात गहराने पर
वेटिंग रूम की उदासी
और साफ़ दिखने लगती थी।
कुछ चेहरे
नींद में भी बेचैन रहते,
कुछ लोग
जागते हुए भी
बहुत दूर चले जाते थे।
मुझे हमेशा लगा—
दुनिया के सारे वेटिंग रूम
दरअसल
ज़िंदगी की छोटी प्रतिकृतियाँ हैं,
जहाँ हम सब
अपनी-अपनी ट्रेन से पहले
थोड़ी देर के लिए
ठहराए गए मुसाफ़िर हैं।
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