गेट बंद था।
पाम के पेड़ वैसे ही खड़े थे — मगर इस बार उनमें कोई हलचल नहीं थी। न हवा की कोई हल्की-सी स्वीकारोक्ति, न पत्तों की धीमी प्रतिक्रिया। जैसे वे भी किसी अनिश्चित प्रतीक्षा में जम गए हों।
झूला बिल्कुल स्थिर था।
पहली बार उसमें कोई गति नहीं थी — न स्मृति की, न हवा की। वह बस एक खाली वस्तु था, जो अचानक अपने अर्थ से अलग हो गया हो।
और बिल्ली भी नहीं थी।
सुना गया कि वह पिंजरे की तरह लगे उस छोटे-से अंतराल को फाँदकर पड़ोसी के आँगन में चली गई थी — जैसे उसे भी किसी अनुपस्थिति का संकेत मिल गया हो।
वही समय था जब नौकर, जो अपने लिए सब्ज़ी लेने बाहर जा रहा था, गेट के पास रुका।
मैंने पूछा —
“घर में कोई है?”
उसने हल्की-सी झिझक के साथ जवाब दिया —
“मैडम काशी गई हैं।”
बस इतना ही।
न कोई विस्तार।
न कोई कारण।
जैसे यह यात्रा भी उसी स्त्री की तरह थी — बिना भूमिका, बिना व्याख्या।
और फिर सब कुछ सामान्य हो गया।
लेकिन यह सामान्यता पहले जैसी नहीं थी।
बंगले का मौन अब पहले जैसा शांत नहीं लग रहा था।
अब उसमें एक खालीपन था — ऐसा खालीपन जो चीज़ों के होने के बाद नहीं, उनके हट जाने के बाद बचता है।
पाम के पेड़ अब भी थे, लेकिन अब वे केवल खड़े थे — किसी की अनुपस्थिति को गिनते हुए।
झूला अब भी था, लेकिन अब वह किसी आंदोलन की संभावना भी नहीं रखता था।
गेट अब भी बंद था, लेकिन अब वह किसी प्रतीक्षा का हिस्सा नहीं था।
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
और मुझे पहली बार लगा कि उस स्त्री का जाना किसी व्यक्ति का जाना नहीं है।
वह जैसे किसी ध्वनि का धीमे-धीमे खत्म हो जाना है —
जिसका अंतिम स्वर सुनाई नहीं देता, बस हवा में रह जाता है।
लोगों ने कहा होगा — वह काशी गई है।
लेकिन यह वाक्य किसी यात्रा का संकेत नहीं था।
यह केवल एक सूचना थी।
और सूचना और उपस्थिति के बीच जो खाली स्थान होता है —
उसी में पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि वह स्त्री वास्तव में किसी जगह की नहीं थी।
वह केवल उस वातावरण की थी
जिसे लोग उसकी मौजूदगी समझते रहे थे।
अब वह वातावरण धीरे-धीरे अपने आप को भूलने लगा था।
और लखनऊ की वह शाम, हमेशा की तरह शांत होकर भी,
इस बार थोड़ी अधिक भारी लग रही थी —
जैसे किसी बहुत हल्के संगीत का अंतिम स्वर हवा में देर तक ठहरा रह गया हो।
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