उस साल लखनऊ में सर्दियाँ देर से आई थीं।
नवंबर बीत चुका था, फिर भी हवा में वह तीखापन नहीं था जो आमतौर पर सुबहों को काटता है। साउथ सिटी की सड़कें उसी तरह शांत थीं, जैसे हमेशा होती थीं — थोड़ी साफ़, थोड़ी खाली, और भीतर से किसी अनकहे अनुशासन में बँधी हुई।
उस बंगले के सामने से गुजरते हुए इस बार कुछ अलग लगा।
गेट आधा खुला था।
पाम के पेड़ वैसे ही खड़े थे, लेकिन उनकी छाया अब पहले से लंबी हो गई थी।
और भीतर बाग़ में हल्की हलचल थी।
वह वहाँ नहीं थी।
झूला खाली था।
चाय का कोई कप नहीं।
सिर्फ़ एक हल्की हवा, जो पौधों के बीच से गुजरकर लौट रही थी।
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
और तभी मुझे पहली बार एक अजीब-सा खालीपन महसूस हुआ — ऐसा नहीं कि कुछ खो गया है, बल्कि ऐसा कि कुछ था ही नहीं, या था तो केवल मेरी आदत में।
तभी पीछे से एक धीमी आवाज़ आई।
“आप आज भी आते हैं।”
मैं मुड़ा।
वह गेट के पास खड़ी थी।
लेकिन इस बार कुछ बदला हुआ था।
वही चेहरा, वही शांत दृष्टि, वही हल्की चाल का आभास।
डिम्पल भी, जब उसने हल्की-सी मुस्कान दी।
पर इस बार उसकी उपस्थिति में एक दूरी थी — ऐसी दूरी जो पहले केवल भावनाओं में थी, अब भौतिक हो गई थी।
वह धीरे-धीरे गेट के पास आई।
न बहुत पास, न बहुत दूर।
बस एक संतुलित दूरी पर।
“झूला खाली है आज,” मैंने कहा, बिना सोचे।
वह हल्के से मुस्कुराई।
“अब वहाँ बैठने की ज़रूरत कम हो गई है।”
उसका वाक्य सरल था।
लेकिन उसमें कोई समाप्ति छिपी थी — किसी चीज़ का अंत नहीं, बल्कि उसकी आवश्यकता का अंत।
हम दोनों कुछ देर चुप रहे।
वह न तो कुछ पूछ रही थी, न कुछ बता रही थी।
बस खड़ी थी — जैसे किसी पुराने दृश्य का अंतिम फ्रेम।
फिर उसने कहा —
“आप लोगों को समझने की कोशिश करते हैं।”
मैं चौंका।
वह आगे बोली —
“पर कुछ लोग समझे जाने के लिए नहीं होते… वे बस देखे जाने के लिए होते हैं।”
उसके शब्दों में कोई शिकायत नहीं थी।
न कोई आग्रह।
बस एक स्वीकारोक्ति।
मैंने पहली बार महसूस किया कि वह किसी भी रिश्ते की भाषा से बाहर है।
न वह किसी को पास बुलाती थी,
न किसी को रोकती थी,
न किसी के जाने से टूटती थी।
उसका संसार प्रतिक्रियाओं से नहीं,
केवल उपस्थिति से बना था।
और शायद इसलिए, वह लोगों की बातों को गहराई से नहीं सुनती थी —
जैसे शब्द उसके भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाते, सिर्फ़ छूकर लौट आते हों।
फिर भी वह दर्द को पहचान लेती थी।
बिना उसे नाम दिए।
बिना उसमें शामिल हुए।
जैसे किसी पुराने अनुभव की स्मृति हो जो अब भावनात्मक नहीं रही, सिर्फ़ समझ बन गई हो।
उसने झूले की तरफ़ देखा।
“कुछ चीज़ें जब बार-बार दोहराई जाती हैं,” उसने कहा,
“तो वे अपना अर्थ नहीं, अपनी आदत खो देती हैं।”
फिर वह हल्की मुस्कान आई — वही डिम्पल के साथ।
लेकिन इस बार वह मुस्कान किसी खुशी की नहीं थी।
वह एक सीमा की तरह थी।
जैसे उसने अपने भीतर किसी हिस्से को बहुत पहले कहीं रख दिया हो, और अब बस उसके होने का संकेत बाकी रह गया हो।
कुछ देर बाद वह मुड़ी।
गेट की तरफ़।
और जाते-जाते उसने बिना पीछे देखे कहा —
“आपको भी एक दिन समझ आएगा… कुछ लोग कहानी नहीं होते।”
और वह चली गई।
गेट धीरे-धीरे बंद हो गया।
पाम के पेड़ वैसे ही खड़े रहे।
हवा पहले जैसी चलती रही।
लेकिन उस दिन मुझे पहली बार लगा कि जिस स्त्री को मैं इतने दिनों से देखता आ रहा था —
वह वास्तव में कभी किसी जगह पर थी ही नहीं।
वह बस एक ऐसी उपस्थिति थी
जो धीरे-धीरे मनुष्य के देखने के ढंग में बस जाती है,
और फिर अचानक दिखना बंद कर देती है —
पर समाप्त नहीं होती।
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