प्लेटफ़ॉर्म : ग्यारहवीं नज़्म — चाय वाला हॉकर
“चाय… चाय… गरम चाय…”
उसकी आवाज़
ट्रेन के शोर को चीरती हुई
हर डिब्बे तक पहुँच जाती थी।
वह दुबला-सा लड़का
एक हाथ में केतली,
दूसरे में कपों का स्टैंड लिए
चलती हुई दुनिया के बीच
लगातार दौड़ता रहता।
प्लेटफ़ॉर्म से डिब्बे तक,
डिब्बे से अगले प्लेटफ़ॉर्म तक—
जैसे उसकी ज़िंदगी
हमेशा किसी ट्रेन के पीछे भाग रही हो।
उसे शायद
किसी किताब में नहीं पढ़ाया गया था
कि थकान क्या होती है,
क्योंकि वह
हर आवाज़ में
नई ऊर्जा भर लेता था।
“भइया, एक कम चीनी…”
“इधर देना…”
“जल्दी…”
और वह
हर पुकार पर
वैसे ही मुड़ता
जैसे पूरी दुनिया
उसी की ज़िम्मेदारी हो।
सर्द सुबहों में
उसकी केतली से उठती भाप
मुझे हमेशा
छोटी-सी उम्मीद जैसी लगती थी।
कई यात्री
उसका चेहरा भूल जाते होंगे,
लेकिन उनकी यात्राओं की याद में
उसकी आवाज़
ज़रूर बची रहती होगी।
एक बार
मैंने उसे
चलती ट्रेन के साथ दौड़ते देखा,
और अचानक लगा—
यह लड़का
सिर्फ़ चाय नहीं बेच रहा,
यह अपनी उम्र बेच रहा है
कुछ रुपयों और
घर की ज़रूरतों के बदले।
फिर भी
उसकी आवाज़ में
शिकायत नहीं थी।
शायद इसलिए
कि इस देश के मेहनतकश लोग
दुख को भी
काम की तरह ढोना सीख जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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