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Friday, 15 May 2026

प्लेटफ़ॉर्म : दसवीं नज़्म — टी स्टॉल

 प्लेटफ़ॉर्म : दसवीं नज़्म — टी स्टॉल

प्लेटफ़ॉर्म का टी स्टॉल

सिर्फ़ चाय बेचने की जगह नहीं था,

वह स्टेशन का

सबसे जागता हुआ कोना था।


सुबह की पहली सीटी से लेकर

रात की आख़िरी ट्रेन तक,

वहाँ हमेशा

भाप उठती रहती थी—

केतली से भी

और लोगों की बातों से भी।


चायवाला

अजीब फुर्ती से

कुल्हड़ों में चाय उड़ेलता,

जैसे हर कप में

थोड़ी-सी गर्मी नहीं,

थोड़ी-सी हिम्मत बाँट रहा हो।


उसके पास

हर तरह के लोग आते थे—

जल्दी में भागते यात्री,

ऊँघते कुली,

टिकट चेकर,

सैनिक,

छात्र,

और वे लोग भी

जिन्हें कहीं जाना नहीं होता था।


कुछ लोग

सिर्फ़ चाय पीते थे,

कुछ

अपनी उदासी।


बरसात की रातों में

टी स्टॉल की रोशनी

बहुत दूर से दिखाई देती थी,

जैसे भीगते हुए प्लेटफ़ॉर्म पर

कोई छोटा-सा आश्रय।


एक बूढ़ा आदमी

हर शाम वहीं बैठता,

धीरे-धीरे चाय खत्म करता

और जाती हुई ट्रेनों को देखता रहता।


किसी ने पूछा

“बाबा, किसी का इंतज़ार है?”


वह मुस्कुराया

“नहीं बेटा,

अब तो बस

आदत बची है।”


उसकी बात सुनकर

मुझे लगा

कई लोग

ज़िंदगी में

घर नहीं,

बस एक टी स्टॉल ढूँढ़ते हैं

जहाँ कोई

उन्हें पहचानता हो।


मुकेश ,,,,,,,,

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