प्लेटफ़ॉर्म : नौवीं नज़्म — इंजन की शंटिंग
रात के आख़िरी पहर
जब ज़्यादातर मुसाफ़िर
नींद और थकान के बीच झूल रहे होते,
तब स्टेशन के किसी अँधेरे हिस्से में
इंजन की शंटिंग शुरू होती थी।
धक्… धक्…
लोहे से लोहे के टकराने की आवाज़ें,
तीखी सीटियाँ,
और अचानक झटके से हिलते डिब्बे।
जैसे कोई अदृश्य हाथ
पूरी रात
ज़िंदगी की रचना बदल रहा हो।
एक इंजन
धीरे-धीरे पीछे आता,
कुछ डिब्बों को अलग करता,
कुछ को जोड़ देता,
और फिर
नई दिशा में लगा देता।
मुझे हमेशा लगता—
रिश्ते भी शायद
ऐसे ही शंट होते हैं।
कुछ लोग
थोड़ी दूर तक साथ चलते हैं,
फिर किसी दूसरी पटरी पर भेज दिए जाते हैं।
कुछ अचानक
हमारी ज़िंदगी में जोड़ दिए जाते हैं,
और कुछ
बिना किसी घोषणा के
चुपचाप अलग हो जाते हैं।
शंटिंग के दौरान
स्टेशन का सन्नाटा
बार-बार टूटता था,
लेकिन उस शोर में भी
एक अजीब तन्मयता थी।
कामगार
टॉर्च की रोशनी में
संकेत देते,
इंजन धीरे-धीरे सरकता,
और पूरी सावधानी से
डिब्बों को अपनी जगह मिलती।
जैसे अँधेरे में भी
किसी व्यवस्था पर भरोसा अब तक बाकी हो।
सुबह होने तक
नई ट्रेन तैयार हो चुकी होती,
और मुसाफ़िरों को
शायद कभी पता भी नहीं चलता
कि रात भर
कितनी चीज़ें बदली गई थीं।
ज़िंदगी भी
कई बार
हमारी नींद के दौरान
चुपचाप
अपनी पटरियाँ बदल देती है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment