प्लेटफ़ॉर्म : आठवीं नज़्म — मालगाड़ी
मालगाड़ी
इस स्टेशन से
हमेशा बिना रुके गुज़रती थी।
न उसमें
खिड़कियों से झाँकते चेहरे होते,
न विदाइयों में हिलते हाथ,
न किसी बच्चे की उत्सुकता।
बस
लोहे के भारी डिब्बे,
एक लंबी थकी हुई आवाज़,
और पटरियों पर
धीरे-धीरे घिसटता हुआ वक़्त।
रात के सन्नाटे में
जब वह गुजरती,
पूरा प्लेटफ़ॉर्म काँप उठता था,
जैसे कोई पुराना दुख
अचानक भीतर से गुज़र गया हो।
लोग
उसे शायद ही ध्यान से देखते थे,
क्योंकि उसमें
कहानियाँ कम
बोझ ज़्यादा होता था।
कोयला, सीमेंट, लोहा,
अनाज या मशीनें
देश का आधा जीवन
शायद इन्हीं डिब्बों में सफ़र करता है,
बिना किसी शोर के।
मुझे हमेशा लगा
मालगाड़ी
उन लोगों जैसी होती है
जो पूरी उम्र
दूसरों का भार ढोते हैं,
लेकिन जिनके हिस्से
तालियाँ कभी नहीं आतीं।
उसके डिब्बों पर
धूल जमी रहती,
कुछ पर पुराने नंबर मिट चुके होते,
और इंजन
थके हुए बैल की तरह
धीरे-धीरे साँस लेता हुआ आगे बढ़ता।
फिर भी
वह रुकती नहीं थी।
शायद इसलिए
कि दुनिया की व्यवस्था
उम्मीदों से नहीं,
ऐसे ही अनदेखे बोझों से चलती है।
और जब वह
अँधेरे में दूर निकल जाती,
पटरियों पर बहुत देर तक
एक कंपन बचा रहता—
ठीक वैसे ही
जैसे मेहनतकश लोगों की थकान
समाज के भीतर
देर तक गूँजती रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,
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