होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 3 May 2026

जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है,

 जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है,

ये दिल का समंदर है, रुकता नहीं है।


लबों पर हँसी है, निगाहों में धुंधल,

मगर दर्द का सिलसिला थमता नहीं है।


कभी ख़्वाब आँखों में रौशन थे ऐसे,

अब उनका कोई भी निशाँ बचता नहीं है।


तेरी याद दिल में धड़कती रही है,

मगर कोई साया भी मिलता नहीं है।


मैं लफ़्ज़ों में कैसे बयाँ कर सकूँ वो,

जो ख़ामोशियों में भी लिखा नहीं है।


ये तन्हा सफ़र है, ये वीरान रस्ता,

जहाँ साथ अपना भी चलता नहीं है।


मुकेश' हाल-ए-दिल मैं किससे कहूँ,

जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है।


मुकेश ,,,,,,

No comments:

Post a Comment