जहाँ साया भी समाप्त हो जाता है
इतनी दूर चल आया हूँ
कि अब
रोशनी भी थकने लगी है।
साये
जो कभी साथ चलते थे,
जो दीवारों पर ठहरते थे,
जो भीतर उतर आते थे
एक-एक करके
छूटते जा रहे हैं।
अब
न आगे कोई अक्स है,
न पीछे कोई परछाईं
सिर्फ़ एक खुला विस्तार,
जहाँ मैं हूँ
पर किसी रूप में नहीं।
पहले डर लगा
जैसे सब कुछ खत्म हो रहा है,
जैसे पहचान
धीरे-धीरे मिट रही हो।
पर फिर
एक अजीब शांति आई
जैसे किसी ने
मेरे भीतर की सारी प्रतिध्वनियाँ
धीरे से बंद कर दी हों।
अब
न कोई पीछा है,
न कोई ठहराव,
न कोई द्वंद्व
क्योंकि साया
द्वैत से जन्म लेता है,
और यहाँ
द्वैत बचा ही नहीं।
मैंने खुद को देखा
बिना आकार,
बिना विस्तार,
बिना किसी और के संदर्भ के।
और पहली बार
ऐसा लगा
कि मैं
सच में हूँ।
साया
हमेशा एक संबंध था
रोशनी और अंधेरे का,
अतीत और वर्तमान का,
मैं और मेरे बीच का।
पर यहाँ
जहाँ सब कुछ
अपने मूल में लौट आया है,
साया भी
अनावश्यक हो गया है।
अब
न उसे ढूँढने की ज़रूरत है,
न उससे बचने की।
क्योंकि
जहाँ साया समाप्त होता है,
वहीं से
अस्तित्व शुरू होता है।
मुकेश --------
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