इदं यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जगत्, आत्मैवैकः अग्रे जगतः सृष्टेः प्राक् आसीत्
नाम-रूपमय जगत् की आत्मात्मक एकता का अद्वैत विवेचन
यह
भाष्यांश Adi
Shankaracharya के अद्वैत वेदान्त का अत्यन्त महत्वपूर्ण
दार्शनिक सूत्र है। यहाँ शंकराचार्य
यह स्पष्ट करते हैं कि
जो जगत् आज हमें
असंख्य भेदों, नामों, रूपों और कर्मों से
युक्त दिखाई देता है, वह
सृष्टि से पूर्व केवल
आत्मा ही था।
अर्थात्
विविधता (Multiplicity)
अन्तिम सत्य नहीं है;
मूल सत्य एकात्म चेतना
है।
मूल
भाष्यांश
इदं
यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जगत्, आत्मैवैकः अग्रे जगतः सृष्टेः प्राक् आसीत्।
पदच्छेद
एवं शब्दार्थ
- इदं — यह
- यत् उक्तम् — जो कहा गया
- नाम-रूप-कर्म-भेद-भिन्नम् — नाम, रूप और कर्म के भेदों से विभक्त
- जगत् — यह संसार
- आत्मा एव — केवल आत्मा ही
- एकः — एकमात्र
- अग्रे — पहले
- जगतः सृष्टेः प्राक् — जगत् की उत्पत्ति से पूर्व
- आसीत् — था
सरल
भावार्थ
यह सम्पूर्ण जगत्, जो आज अनेक
नामों, रूपों और क्रियाओं के
भेद से युक्त दिखाई
देता है, सृष्टि से
पूर्व केवल आत्मा ही
था — एकमेव अद्वितीय।
“नाम–रूप–कर्म–भेदभिन्नं जगत्” का गहन अर्थ
शंकराचार्य
जगत् की बहुलता को
तीन आधारों पर समझाते हैं—
1. नाम
(Name)
प्रत्येक
वस्तु को हम एक
विशेष नाम देते हैं—
वृक्ष ,मनुष्य ,नदी ,पर्वत ,सूर्य
नाम
मानसिक पहचान (mental
categorization) का साधन है। नाम
बदलने से वस्तु का
अस्तित्व नहीं बदलता।
2. रूप
(Form)
रूप
दृश्य भिन्नता है— कोई लम्बा
है, कोई छोटा,कोई
सूक्ष्म, कोई विराट। रूप
इन्द्रियगोचर विविधता उत्पन्न करता है।
3. कर्म
(Function / Activity)
प्रत्येक
वस्तु की एक क्रिया
या प्रयोजन है— अग्नि जलाती
है, जल शीतल करता
है, मन सोचता है,
बुद्धि निर्णय करती है।
इसी
कर्म-भेद से संसार
गतिशील प्रतीत होता है।
“भेदभिन्नं
जगत्” — विविधता का अनुभव
मनुष्य
जिस संसार को देखता है,
वह भेदों का संसार है—
मैं और तुम, सुख
और दुःख, जीवन और मृत्यु,
विषय और ज्ञाता। यह
भिन्नता ही व्यवहारिक संसार
(व्यवहारिक सत्य) का आधार है।
किन्तु
शंकराचार्य कहते हैं— यह
भिन्नता अन्तिम सत्य नहीं, केवल
प्रकट अवस्था है।
“आत्मैवैकः”
— सृष्टि से पूर्व केवल आत्मा
यहाँ
अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धान्त
प्रकट होता है—सृष्टि
से पहले कोई दूसरा
पदार्थ नहीं था।
न—
पृथक् प्रकृति, स्वतन्त्र पदार्थ, परमाणु, जड़ प्रधान, या
अलग ईश्वर। केवल आत्मा — शुद्ध
चैतन्य — था।
अद्वैत
का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त
“भेद प्रकट है, मूल सत्ता एक है” शंकराचार्य का तात्पर्य यह
नहीं कि संसार बिल्कुल
मिथ्या कल्पना है जैसे “कुछ
है ही नहीं”; बल्कि—विविधता अनुभव में सत्य है,
पर उसका आधार एक
चेतना है।
जैसे—
- स्वर्ण से अनेक आभूषण बनते हैं, ,मिट्टी से अनेक पात्र, ,जल से अनेक तरंगें, -वैसे ही आत्मा से जगत् का नाम-रूपात्मक प्राकट्य होता है।
“अग्रे”
— सृष्टि से पूर्व की अवस्था
“अग्रे” शब्द
अत्यन्त दार्शनिक है। यह कोई कालविशेष मात्र
नहीं, बल्कि अव्यक्त अवस्था (undifferentiated
state) को सूचित करता है।सृष्टि से
पूर्व—नाम नहीं थे,
रूप नहीं थे, विभाजन
नहीं था, केवल एक
अव्यक्त चेतन सत्ता थी।
अव्याकृत
अवस्था क्या है?
शंकराचार्य
आगे कहते हैं—“प्रागुत्पत्तेरव्याकृतनामरूपभेदम्”अर्थात् सृष्टि से पहले जगत्
“अव्याकृत” था।
अव्याकृत का
अर्थ-अप्रकट, अविभाजित, बीजरूप, चेतना में अवस्थित सम्भावना।
जैसे—वृक्ष बीज में अप्रकट
रहता है, स्वप्न मन
में अप्रकट रहता है, वैसे
ही सम्पूर्ण जगत् आत्मा में
अव्यक्त था।
जगत्
आत्मा से पृथक् क्यों प्रतीत होता है?
यह अद्वैत का मुख्य प्रश्न
है।यदि सब आत्मा ही
है, तो भिन्नता क्यों
दिखाई देती है?शंकराचार्य
का उत्तर—
नाम
और रूप के कारण।जैसे—एक ही जल
तरंग, बुद्बुद, फेन आदि कहलाता
है, पर वास्तव में
सब जल ही है।
उसी
प्रकार—जीव, जगत्, देवता,
प्रकृति, सब उसी एक
चेतना की विविध अभिव्यक्तियाँ
हैं।
“सृष्टि”
का अद्वैत अर्थ -अद्वैत में सृष्टि का
अर्थ “शून्य से निर्माण” नहीं
है।यह “प्रकटीकरण” (manifestation) है।
आत्मा
स्वयं नहीं बदलता; केवल
नाम-रूप प्रकट होते
हैं। इसीलिए ब्रह्म—निरविकार रहता है, पर
जगत् का आधार भी
वही है।
चेतना-दर्शन (Consciousness
Philosophy) से सम्बन्ध
आधुनिक
Consciousness Studies में
एक प्रश्न है—क्या चेतना
पदार्थ से उत्पन्न होती
है, या पदार्थ चेतना
में प्रकट होता है?
यह
मन्त्र दूसरे दृष्टिकोण के निकट है—चेतना प्राथमिक है, जगत् उसकी
अभिव्यक्ति है।
यह दृष्टि कुछ आधुनिक Idealist philosophers तथा Panpsychism की धारणाओं से
संवाद स्थापित करती है।
Phenomenology से
तुलना -Edmund
Husserl ने कहा कि अनुभव
की समस्त वस्तुएँ चेतना में constituted” होती हैं।अद्वैत इससे
आगे जाकर कहता है—केवल अनुभव नहीं,
सम्पूर्ण अस्तित्व चेतना-आधारित है।
Psychology और Selfhood -मानव मन निरन्तर
नाम और रूप बनाता
है—पहचान, स्मृति, सम्बन्ध, अहंकार।
उपनिषद्
कहता है— इन सबके
पीछे एक मौलिक “I-am-ness” है — शुद्ध
आत्मबोध।
साधना
में महत्व
इस मन्त्र का ध्यान करते
समय साधक निम्न चिन्तन
कर सकता है—
“क्या
मैं केवल नाम और
रूप हूँ?”
“विचारों और भूमिकाओं से
पहले मेरा वास्तविक स्वरूप
क्या है?”
“क्या सब अनुभव एक
ही चेतना में नहीं घटित
हो रहे?”
यह अभ्यास धीरे-धीरे भेदबुद्धि
को शान्त कर साक्षीभाव की
ओर ले जाता है।
अन्य
उपनिषदों से साम्य
यह विचार अनेक उपनिषदों में
मिलता है—
- छान्दोग्य उपनिषद् — “सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्”
- बृहदारण्यक उपनिषद् — “आत्मैवेदमग्र आसीत्”
- माण्डूक्य उपनिषद् — जगत् चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
शंकराचार्य
का यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त का मूल प्रतिपादन है कि यह सम्पूर्ण नाम-रूप-कर्ममय जगत् सृष्टि से पूर्व केवल आत्मा ही था। विविधता केवल प्रकट अवस्था है; मूल सत्ता एक है। संसार के असंख्य भेद अन्ततः उसी शुद्ध चेतना में अधिष्ठित हैं। इस प्रकार आत्मा कोई सीमित जीव नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का अद्वितीय आधार है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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