शहरों में
लोग नहीं चलते
परछाइयाँ चलती हैं
लेकिन आज
परछाइयाँ भी थोड़ी बदली-बदली हैं
अब वे
दीवारों से नहीं
स्क्रीन से निकलती हैं
उँगलियों के इशारों पर
रास्ते तय करती हैं
और रिश्तों के नाम पर
कुछ एल्गोरिद्म
साँस लेते हैं
यहाँ धूप भी
सीधी नहीं पड़ती
वो पहले
काँच से गुज़रती है
फिर किसी चेहरे पर
अनजान-सा रंग छोड़ जाती है
चाय की दुकानों पर
अब बहसें नहीं होतीं
बस नोटिफिकेशन की
हल्की-सी झंकार होती है
और लोग
एक-दूसरे के पास होकर भी
इतने दूर होते हैं
कि दूरी भी
शर्मिंदा हो जाए
रातें अब
नींद नहीं लातीं
बस थकान को
अपडेट करती रहती हैं
और शहर
धीरे-धीरे सीख रहा है
कि यहाँ जीने से ज़्यादा
दिखना ज़रूरी हो गया है
और परछाइयाँ
अब इंसानों से पहले
ऑनलाइन हो जाती हैं
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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