पतंजलि का मौन — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह आदमी बोलता नहीं था, लेकिन उसके मौन में भाषा की तरह व्यवस्था थी।
लोग उसे योगी कहते थे, पर वह किसी पहचान में नहीं रहता था।
वह जब चलता था, तो ऐसा लगता था जैसे भीतर की हलचल धीरे-धीरे स्थिर हो रही हो।
शरीर आगे बढ़ता था, पर मन किसी और दिशा में भीतर उतरता जाता था।
कभी-कभी वह आँखें बंद करके बैठ जाता था।
बाहर की दुनिया उस समय भी चलती रहती थी, पर उसके लिए वह गति एक धुंधली परत बन जाती थी।
उसने मन को देखा
और मन पहली बार अपने आप को देखे जाने से थोड़ा असहज हुआ।
विचार आते थे, पर वह उन्हें रोकता नहीं था।
वह उन्हें बस गुजरने देता था, जैसे कोई नदी को रोकने की कोशिश न करे, केवल उसके प्रवाह को समझने लगे।
धीरे-धीरे उसके भीतर एक दूरी बनने लगी
न संसार से, न जीवन से, बल्कि अपने ही प्रतिक्रिया-तंत्र से।
लोग कहते थे, वह ध्यान में है।
पर वह किसी “अवस्था” में नहीं था — वह अवस्थाओं के बीच की जगह को पहचान रहा था।
एक दिन किसी ने उससे पूछा — “तुम क्या खोज रहे हो?”
उसने आँखें खोलीं, पर उत्तर शब्दों में नहीं आया।
उसकी चुप्पी ही उत्तर बन गई
कि खोज बाहर नहीं, उस क्षण में है जहाँ मन अपने आप को देखना बंद कर देता है।
समय बीता।
उसकी छवि एक ऋषि की तरह बन गई, लेकिन वह स्वयं किसी छवि में नहीं था।
और जो लोग उसे समझने की कोशिश करते हैं,
वे अक्सर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ विचार समाप्त होते हैं
और केवल एक शांत रिक्तता बची रहती है,
जो किसी उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करती।
मुकेश ,,,,,,,,,
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