कणाद ऋषि और धूल का ब्रह्मांड — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह ऋषि चलता नहीं था, वह फैलता था।
जहाँ से वह गुजरता, वहाँ चीज़ें छोटी नहीं रहती थीं — वे और छोटे अर्थों में टूटने लगती थीं।
लोग उसे कणाद कहते थे।
पर यह नाम किसी व्यक्ति का नहीं लगता था, बल्कि किसी दृष्टि का लगता था — जैसे किसी ने पदार्थ को पहली बार ध्यान से देखा हो।
वह जंगल में अकेला रहता था।
पर उसका अकेलापन खाली नहीं था। उसमें बहुत छोटे-छोटे प्रश्न थे, जो दिखाई नहीं देते थे लेकिन हर जगह मौजूद रहते थे।
वह कभी-कभी मिट्टी उठाता और उसे देखता।
साधारण लोग मिट्टी देखते थे, पर वह उसके भीतर छिपे छोटे अस्तित्वों को देखता था —
ऐसे अस्तित्व जो आँखों से नहीं, विचार के टूटने से दिखाई देते हैं।
एक दिन उसने कहा — “सब कुछ कणों से बना है।”
लोगों ने सोचा, यह एक वाक्य है।
पर उसके लिए यह एक अनुभव था — जैसे दुनिया पहली बार खुद को तोड़कर समझ रही हो।
वह किसी बड़े सत्य की घोषणा नहीं कर रहा था।
वह बस यह बता रहा था कि बड़ा होना भी एक भ्रम हो सकता है।
उसकी दृष्टि में पेड़ पेड़ नहीं थे — वे असंख्य छोटे अस्तित्वों का एक अस्थायी समझौता थे।
नदी बह नहीं रही थी — वह छोटे-छोटे क्षणों का लगातार टूटना थी।
लोग उसे समझने की कोशिश करते थे, लेकिन वह समझ किसी बड़े विचार में नहीं आती थी।
वह केवल ध्यान की सूक्ष्मता में खुलती थी।
कभी-कभी वह धूल को देखता और मुस्कुराता।
जैसे उसे पता हो कि पूरा ब्रह्मांड किसी बहुत छोटे आरंभ से बार-बार बन रहा है।
और फिर वह चुप हो जाता
क्योंकि जो चीज़ बहुत छोटे में दिखती है,
उसके लिए शब्द हमेशा बड़े पड़ जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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