अंगूठे में आँख वाला ऋषि — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह ऋषि था, पर उसका देखना सामान्य आँखों से नहीं था।
कहते हैं, उसकी दृष्टि किसी एक स्थान पर नहीं रहती थी — वह छोटे-छोटे निर्णयों के भीतर चलती थी।
लोग उसे “अक्षपाद” कहते थे।
पर यह नाम केवल पहचान नहीं था, यह एक संकेत था — जैसे किसी ने कहा हो कि वह पैरों से नहीं, सूक्ष्म बिंदुओं से चलता है।
उसके अंगूठे में एक आँख थी
या शायद यह कहना अधिक सही होगा कि उसका ध्यान इतना सूक्ष्म था कि वह हर छोटे स्पर्श में देखने लग जाता था।
वह किसी बड़े दृश्य को नहीं देखता था।
उसके लिए संसार बड़े चित्रों में नहीं, छोटे निर्णयों में खुलता था
“यह सही है या यह गलत?” — इसी प्रश्न की परतों में उसकी दृष्टि सांस लेती थी।
लोग कहते थे, वह जब चलता है तो रास्ता नहीं बदलता —
बल्कि रास्ता उसके देखने के कारण थोड़ा और स्पष्ट हो जाता है।
उसके पास कोई शोर नहीं था।
न युद्ध, न घोषणा।
सिर्फ तर्क की धीमी गति थी, जो किसी भी भाव को तुरंत स्वीकार नहीं करती थी।
एक दिन किसी ने उससे पूछा — “तुम देखते क्या हो?”
उसने अपने अंगूठे की ओर देखा
और वहाँ कोई आँख दिखाई नहीं दी, लेकिन एक तरह की जागरूकता थी, जो हर स्पर्श को निर्णय में बदल देती थी।
उसने कहा
“मैं वह देखता हूँ जो बाकी लोग छूकर छोड़ देते हैं।”
उस दिन लोगों को पहली बार लगा कि दर्शन कोई विचार नहीं,
बल्कि एक अलग तरह की दृष्टि है
जो बड़े संसार को नहीं, छोटे सत्य को पकड़ती है।
समय बीता।
कहानियाँ बदलीं।
पर उस ऋषि की छवि रह गई — एक ऐसे व्यक्ति की तरह
जिसकी आँखें किसी चेहरे पर नहीं,
बल्कि निर्णय के सबसे छोटे बिंदु पर खुलती थीं।
और शायद यही कारण था कि वह देखता नहीं था
वह हर चीज़ को न्याय बनने तक सुनता रहता था।
मुकेश ,,,,
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