चेखव का प्रेम — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह प्रेम करता था, पर प्रेम को घोषणा की तरह नहीं जीता था। उसके भीतर भावनाएँ थीं, लेकिन वे हमेशा पूरी तरह बाहर नहीं आती थीं। जैसे कोई पत्र लिखा जा रहा हो, पर उसे भेजने से पहले कई बार पढ़कर रख दिया जाए।
वह जब किसी के पास होता, तो उसकी उपस्थिति बहुत तीव्र नहीं होती थी। वह अधिकतर शांत रहता, जैसे वह प्रेम को घटित होने दे रहा हो, उसे नियंत्रित नहीं कर रहा हो।
उसके लिए प्रेम कोई घटना नहीं था। वह एक स्थिति थी — जिसमें प्रतीक्षा भी शामिल थी, दूरी भी और समझ भी।
वह लिखता था, लेकिन उसके शब्द अक्सर उतना नहीं कहते थे जितना भीतर चल रहा होता था। पत्रों में स्नेह होता था, पर बीच-बीच में ऐसी चुप्पियाँ भी होती थीं जिन्हें शब्द नहीं भर पाते थे।
वह अपनी प्रिय के जीवन को भी उसी तरह देखता था जैसे कोई कहानी देखी जाती है — जिसमें हर पात्र को पूरी स्वतंत्रता दी जाती है, लेकिन वह स्वतंत्रता कभी पूरी निकटता में नहीं बदलती।
कभी-कभी वह सोचता था कि शायद प्रेम का अर्थ साथ होना नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझते हुए अलग रहना भी हो सकता है।
उसके रिश्ते में कोई बड़ा शोर नहीं था। न तीव्र विवाद, न तीव्र स्वीकार। बस एक धीमी-सी उपस्थिति थी, जो समय के साथ और स्पष्ट होती जाती थी।
और अंत में यह कहना कठिन था कि वह प्रेम समाप्त हुआ या बस किसी और रूप में बदल गया —
जैसे कोई कहानी अपने अंतिम वाक्य पर नहीं,
बल्कि अपनी चुप्पी पर खत्म होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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