रात अब
मेरे कमरे में दरवाज़े से नहीं आती,
वह धीरे-धीरे
किताबों के बीच उगती है।
पहले मेज़ पर रखे गिलास में उतरती है,
फिर परदों पर फैल जाती है
जैसे किसी बूढ़े चित्रकार ने
काले रंग में थोड़ा-सा धुआँ मिला दिया हो।
मैं देर तक
दीवार पर चलती पंखे की परछाइयाँ देखता रहता हूँ।
वे हर रात
एक जैसी लगती हैं,
फिर भी कभी वैसी नहीं होतीं।
अब उदासी भी
सीधे दिल में नहीं उतरती।
वह पहले
जूते के पास पड़ी धूल बनती है,
फिर धीरे-धीरे
आवाज़ में आकर बस जाती है।
कभी कोई पुरानी याद
अचानक नहीं आती
वह खिड़की की सलाखों पर
बारिश की पहली बूंद की तरह ठहरती है,
और फिर पूरी रात
टपकती रहती है भीतर।
मैंने कई दिनों से
घड़ी की टिक-टिक को गौर से सुना है।
उसमें वक़्त कम,
किसी अदृश्य दर्ज़ी की कैंची ज़्यादा सुनाई देती है
जो हर सेकंड
ज़िंदगी से थोड़ा-थोड़ा कपड़ा काटती रहती है।
और हम सब,
अपनी-अपनी देह पहने,
धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं।
कभी सुबह
अलमारी खोलते हुए लगता है
कपड़ों में नहीं,
पुराने मौसमों में हाथ डाल रहा हूँ।
एक कमीज़ से
किसी भूली हुई सड़क की धूप गिरती है,
दूसरी से
किसी के बालों में लगी बारिश की गंध।
शायद इंसान
यादों से नहीं बना होता,
बल्कि उन चीज़ों से बना होता है
जिन्हें वह फेंक नहीं पाता।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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