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Thursday, 28 May 2026

कभी-कभी लगता है मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहा,

 कभी-कभी लगता है

मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहा,

बस उसे होते हुए देख रहा हूँ।


जैसे किसी पुराने सिनेमाघर में

धुँधली-सी फ़िल्म चल रही हो,

और मैं आख़िरी सीट पर बैठा

बिना किसी दिलचस्पी के

उसे अंत तक देखता रहूँ।


अब न किरदारों से लगाव होता है,

न कहानी से शिकायत।


जो चला गया,

वह भी ठीक।

जो बचा हुआ है,

वह भी ठीक।


मैंने अब

“क्यों” पूछना छोड़ दिया है।


कुछ चीज़ें

बिना वजह टूटती हैं,

बिना वजह मिलती हैं,

और बिना वजह

सारी उम्र साथ चलती रहती हैं।


अजीब है 

पहले मैं ख़ुद को ढूँढता था,

अब ख़ुद से बचकर निकल जाता हूँ।


आईने में चेहरा

पहचान में तो आता है,

मगर अपना नहीं लगता।


जैसे कोई पुराना शहर

जहाँ कभी रहा था आदमी,

मगर अब लौटे

तो रास्ते भी अजनबी लगें।


फिर भी

सब कुछ बुरा नहीं है।


चाँद अब भी निकलता है,

पेड़ों पर हवा अब भी उतरती है,

और देर रात

किसी दूर जाती ट्रेन की आवाज़

अब भी दिल को

थोड़ी देर के लिए रोक देती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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