बारिश के बाद की सड़क
(हेमिंग्वे की शैली से प्रेरित एक नज़्म)
बारिश रुक चुकी थी।
सड़क अब भी भीगी हुई थी।
एक आदमी
धीरे-धीरे चलता हुआ
उस पुराने मकान के सामने से गुज़रा
जहाँ कभी
एक औरत उसका इंतज़ार करती थी।
खिड़की बंद थी।
परदे बदले हुए थे।
और दरवाज़े का रंग भी।
उसने रुककर
सिगरेट निकालनी चाही,
फिर जेब में वापस रख ली।
कुछ आदतें
छूट जाती हैं।
कुछ सिर्फ़ बूढ़ी हो जाती हैं।
सड़क पर पानी जमा था।
उसमें पीली बत्ती काँप रही थी।
उसे याद आया —
एक रात
यहीं खड़े होकर उसने कहा था,
“मैं लौट आऊँगा।”
लेकिन आदमी
अक्सर वहाँ नहीं लौटते
जहाँ वे लौटने का वादा करते हैं।
वे बस
उन वाक्यों के आसपास भटकते रहते हैं
जो उन्होंने कभी जल्दी में कह दिए थे।
दूर कहीं
ट्रेन की आवाज़ आई।
उसने एक बार
उस मकान की ओर देखा,
फिर चल पड़ा।
बारिश रुक चुकी थी।
लेकिन कुछ चीज़ें
भीतर बहुत देर तक भीगती रहती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,
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