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Monday, 25 May 2026

बारिश के बाद बची हुई गन्ध

 बारिश के बाद बची हुई गन्ध

आज सुबह
बारिश रुकने के बहुत देर बाद
मैं गली में निकला।

आसमान साफ़ हो चुका था,
लेकिन हवा में
अब भी भीगे हुए समय की गन्ध तैर रही थी।

पेड़ों से
पानी की आख़िरी बूँदें गिर रही थीं,
जैसे रात
धीरे-धीरे अपने वाक्य पूरे कर रही हो।

सड़क पर
कुछ लोग जल्दी में गुज़र रहे थे,
कुछ दुकानों के शटर आधे उठे थे,
और नालियों में
बहता हुआ पानी
अपने साथ
शहर की थकान ले जा रहा था।

मैं बिना किसी वजह
धीरे-धीरे चलता रहा।

फिर अचानक लगा 

कुछ गन्धें
सिर्फ़ मिट्टी की नहीं होतीं।

वे स्मृतियों की भी होती हैं।

भीगी हुई दीवारों की गन्ध,
पुरानी किताबों की सीलन,
बरसात में सूखते कपड़ों की भाप,
या किसी के बालों से आती
हल्की-सी चमेली।

मनुष्य अक्सर चेहरों को भूल जाता है,
लेकिन गन्धों को नहीं भूलता।

वे बहुत वर्षों तक
शरीर के किसी अँधेरे हिस्से में
चुपचाप पड़ी रहती हैं।

फिर एक दिन
अचानक लौट आती हैं
और बिना चेतावनी
पूरा अतीत खोल देती हैं।

एक मोड़ पर
मैं रुका।

वहाँ एक बंद घर था
जिसकी खिड़कियों पर
धूल जमी हुई थी।

लेकिन भीतर से
हल्की-सी भीगी लकड़ी की गन्ध आ रही थी।

और पता नहीं क्यों
उसी क्षण
मुझे लगा
कभी वहाँ कोई लड़की रहती होगी
जो बारिश के बाद
छत पर देर तक खड़ी रहती थी।

शायद उसके बाल बहुत लम्बे रहे होंगे।

शायद वह
भीगते हुए पौधों को छूती होगी।

शायद उसने भी
कभी किसी की प्रतीक्षा की होगी
इतनी चुप्पी से
कि घर की दीवारों ने तक
उसे याद रखना सीख लिया हो।

मैं कुछ देर
उस बंद घर को देखता रहा।

फिर आगे बढ़ गया।

पीछे से
एक रिक्शा गुज़रा,
किसी बच्चे की हँसी आई,
कहीं दूर
रेडियो पर पुराना गीत बज रहा था।

शहर धीरे-धीरे
अपने रोज़मर्रा के शोर में लौट रहा था।

लेकिन मेरे भीतर
अब भी
बारिश के बाद बची हुई वह गन्ध थी 

जो किसी मौसम की नहीं,
किसी अनुपस्थित जीवन की थी।

और मुझे लगा,

मनुष्य शायद
यादों को आँखों में नहीं रखता।

वह उन्हें
अपनी साँसों में छिपाकर रखता है।

— मुकेश

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