खिड़कियों से कोई आसमान पूरा नहीं दिखता
एक पुराना कमरा है,
हल्की धूप से भरा,
और उसकी दीवार में
एक छोटी-सी खिड़की है।
मैं बरसों
उसी खिड़की से
आसमान को देखता रहा।
मुझे लगता था
यही पूरा आकाश है
यहीं तक दुनिया है,
यहीं तक सत्य।
फिर एक दिन
हवा ने परदा हटाया
और मैंने देखा,
खिड़की से बाहर भी
एक और विस्तार था
बहुत विशाल,
बहुत अनजान।
उस क्षण
अपने ही यक़ीन पर
थोड़ी शर्म आई।
हम कितनी आसानी से
अपनी सीमाओं को
संपूर्ण समझ लेते हैं।
मैंने कमरे से बाहर क़दम रखा।
धूप अलग थी,
हवा में एक अजीब खुलापन था,
जैसे कोई अदृश्य गिरह
धीरे-धीरे खुल रही हो।
तब समझ आया
खिड़कियाँ बुरी नहीं होतीं,
वे बस
पूरा आकाश नहीं दिखातीं।
और शायद
हर इंसान
अपनी-अपनी खिड़की से
दुनिया को देखकर
उसे अंतिम सत्य मान बैठता है।
अब भी
मैं कभी-कभी
उस पुराने कमरे में लौटता हूँ,
मगर सिर्फ़ इतना याद रखने के लिए
कि आकाश
हमारी दृष्टि से कहीं बड़ा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment