बारिश में कोई चेहरा पूरा नहीं दिखता
बारिश की एक लंबी सड़क है,
भीगी हुई,
पीली रोशनियों में काँपती हुई।
मैं उस पर चला
तो हर आदमी
मुझे अधूरा दिखाई दिया।
किसी की आँखें साफ़ थीं,
पर चेहरा धुँधला,
किसी की मुस्कान बची थी,
पर उसके पीछे
बहुत गहरा अकेलापन था।
बारिश
सब कुछ धो नहीं रही थी,
कुछ चीज़ों को
और ज़्यादा उजागर कर रही थी।
मैंने एक शीशे में
अपना अक्स देखा
पानी की बूँदें
उसे बार-बार तोड़ रही थीं।
तब लगा,
शायद इंसान भी
ऐसा ही होता है।
कोई भी
एक रूप में नहीं रहता,
हर दुःख,
हर बिछड़न,
हर प्रेम
उसके चेहरे को थोड़ा बदल देता है।
मैं देर तक
उसी बारिश में भीगता रहा,
बिना छतरी,
बिना किसी जल्दी के।
और पहली बार
मुझे अपना बिखरना
बुरा नहीं लगा।
क्योंकि
कुछ सच्चाइयाँ
सिर्फ़ तब दिखाई देती हैं
जब भीतर की दीवारें
भीगने लगती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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