दो सायों के बीच
दो सायों के बीच
मैं खड़ा हूँ
एक आगे, एक पीछे,
और मैं
किसी का भी पूरा नहीं।
आगे वाला साया
मुझसे तेज़ चलता है,
जैसे वह मेरा भविष्य हो
लंबा, अनिश्चित,
हर कदम के साथ बदलता हुआ।
पीछे वाला साया
धीमे-धीमे घिसटता है,
जैसे अतीत
थका हुआ,
पर हटने को तैयार नहीं।
मैं बीच में हूँ
जहाँ रोशनी सबसे तीखी है,
जहाँ कोई साया टिक नहीं पाता,
फिर भी
दोनों मुझे खींचते रहते हैं।
कभी मैं आगे झुकता हूँ,
तो भविष्य का साया
मुझमें समा जाता है,
कभी पीछे मुड़ता हूँ,
तो अतीत
मेरे कंधों पर बैठ जाता है।
अजीब संतुलन है
दोनों साये
मुझे पूरा करना चाहते हैं,
और मैं
टुकड़ों में बँटता जाता हूँ।
मैंने सोचा—
किसी एक को चुन लूँ,
पर साये चुने नहीं जाते,
वे बस
रोशनी के साथ तय होते हैं।
तब मैंने
चलना शुरू किया
न आगे की जल्दी,
न पीछे का बोझ
बस वर्तमान की उस रेखा पर
जहाँ दोनों साये
मेरे साथ-साथ बहते हैं।
और धीरे-धीरे
समझ में आया
मैं दो सायों के बीच नहीं,
दो समयों के बीच खड़ा हूँ।
और शायद
यही बीच का क्षण
सबसे सच्चा है
जहाँ साया भी
कुछ पल के लिए
मुझसे अलग नहीं रहता।
मुकेश --------
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