अँधेरे की नदी में साया नहीं होता”
अँधेरे की एक नदी है
गहरी, स्थिर,
बिना किसी किनारे के।
मैं उसमें उतरा
तो सबसे पहले
अपना साया खोजा
पर वहाँ
कुछ भी साथ नहीं आया।
न कोई परछाईं,
न कोई अक्स,
न कोई वह परिचित आकार
जो हर रोशनी में
मुझे पहचान देता था।
अजीब खालीपन था
जैसे मैं हूँ भी
और नहीं भी।
मैंने हाथ बढ़ाया
पानी नहीं,
सिर्फ़ एक गहराई थी
जो मुझे अपने भीतर खींच रही थी।
वहाँ
कोई दोहराव नहीं था,
कोई प्रतिबिंब नहीं
सिर्फ़ एक सीधी उपस्थिति,
निर्वस्त्र, निर्विवाद।
तब समझ आया
साया तो रोशनी की भाषा है,
और इस अँधेरे में
कोई भाषा नहीं बचती।
यहाँ
न अतीत पीछा करता है,
न यादें आकार लेती हैं,
न कोई डर
किसी छाया में छिप सकता है।
अँधेरे की इस नदी में
सब कुछ
सीधा हो जाता है
मैं भी।
और जब मैं लौटता हूँ
वापस रोशनी में,
तो मेरा साया
फिर से मेरे साथ चल पड़ता है
पर अब
मैं जानता हूँ,
वह मैं नहीं हूँ।
क्योंकि
जिसने अँधेरे की नदी देख ली,
वह साये से
कभी पूरी तरह नहीं डरता।
मुकेश --------
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