ईशावास्योपनिषद् का सप्तम मन्त्र एवं शाङ्करभाष्य
आत्मैकत्व-दर्शन, मोह-शोक की निवृत्ति और अद्वैत का परम निष्कर्ष
मन्त्र — यथारूप
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ ७ ॥
मन्त्र का यथावत् हिन्दी अनुवाद
जिस ज्ञानी पुरुष के लिए समस्त भूत आत्मा ही हो गए हैं, उस एकत्व का दर्शन करने वाले के लिए वहाँ कौन-सा मोह और कौन-सा शोक रह सकता है?
शाङ्करभाष्यम् — यथारूप
इममेवार्थमन्योऽपि मन्त्र आह — यस्मिन् सर्वाणि भूतानि। यस्मिन्काले यथोक्तात्मनि वा तान्येव भूतानि सर्वाणि परमार्थात्मदर्शनादात्मैवाभूदात्मैव संवृत्तः परमार्थवस्तुजानतः, तत्र तस्मिन्काले तत्रात्मनि वा को मोहः कः शोकः। शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजमजानतो भवति, न त्वात्मैकत्वं विशुद्धं गगनोपमं पश्यतः। “को मोहः कः शोकः” इति शोकमोहयोर्विद्याकार्ययोराक्षेपेणासम्भवप्रदर्शनात्सकारणस्य संसारस्यात्यन्तमेवोच्छेदः प्रदर्शितो भवति॥ ७ ॥
शाङ्करभाष्य का यथारूप हिन्दी अनुवाद
इसी अर्थ को दूसरा मन्त्र भी कहता है — “यस्मिन् सर्वाणि भूतानि”।
जिस समय अथवा जिस पूर्वोक्त आत्मा में समस्त भूत परमार्थस्वरूप आत्मा के दर्शन के कारण आत्मा ही हो गए हैं, अर्थात् परमार्थतत्त्व को जानने वाले के लिए सब कुछ आत्मरूप ही हो गया है — उस समय अथवा उस आत्मा में कौन-सा मोह और कौन-सा शोक हो सकता है?
शोक और मोह अज्ञानी पुरुष के लिए काम और कर्म के बीजस्वरूप होते हैं; आत्मा के एकत्वरूप, विशुद्ध और आकाश के समान स्वरूप को देखने वाले के लिए नहीं।
“कौन-सा मोह और कौन-सा शोक” — इस प्रकार शोक और मोह, जो अविद्या के कार्य हैं, उनके असम्भव होने का निर्देश करके कारण सहित संसार का अत्यन्त उच्छेद (पूर्ण विनाश) ही यहाँ प्रदर्शित किया गया है।
आत्मैकत्व और संसार-निवृत्ति
ईशावास्योपनिषद् के सप्तम मन्त्र एवं शाङ्करभाष्य का दार्शनिक अध्ययन
ईशावास्योपनिषद् का सप्तम मन्त्र उपनिषद्-दर्शन की उस चरम अनुभूति का उद्घोष है जहाँ आत्मा और जगत् का समस्त द्वैत विलीन हो जाता है। यदि षष्ठ मन्त्र में आत्मैकत्व-दर्शन के नैतिक परिणाम — “न विजुगुप्सते” — का प्रतिपादन था, तो सप्तम मन्त्र उसके आध्यात्मिक और अस्तित्वगत परिणाम को प्रकट करता है — “को मोहः कः शोकः”।
यह मन्त्र केवल शोक-मुक्ति का उपदेश नहीं, बल्कि संसार के मूल कारण — अविद्या — के उच्छेद की घोषणा है। शंकराचार्य इस भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि मोह और शोक केवल मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कर्म-संसार के बीज हैं। आत्मज्ञान से इनका मूल सहित विनाश हो जाता है।
मन्त्र का दार्शनिक स्वरूप
मन्त्र का केन्द्रबिन्दु है —
“एकत्वमनुपश्यतः”
अर्थात् जो समस्त अस्तित्व में एक ही आत्मा का दर्शन करता है।
यहाँ “अनुपश्यति” शब्द पुनः महत्वपूर्ण है। यह केवल तर्क या बौद्धिक स्वीकृति नहीं, बल्कि अनुभूत सत्य का निरन्तर दर्शन है।
ज्ञानी के लिए जगत् पृथक् वस्तुओं का समूह नहीं रह जाता; वह आत्मस्वरूप में अभिन्न अनुभव होता है।
“आत्मैवाभूत्” — अद्वैत की चरम अनुभूति
शंकराचार्य कहते हैं —
“सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूत्”
यहाँ “आत्मैव” अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं कि भूत आत्मा के समान हैं, बल्कि वे आत्मा ही हैं।
अद्वैत वेदान्त में यह अनुभूति केवल बौद्धिक एकता नहीं, बल्कि सत्ता की अद्वितीयता (non-dual reality) है। भेद केवल नाम-रूप का है; तत्त्वतः सब ब्रह्मस्वरूप है।
यहाँ ज्ञानी “दूसरे” का अनुभव खो देता है। और जहाँ दूसरा नहीं, वहाँ भय, शोक और मोह कैसे सम्भव हों?
मोह और शोक का दार्शनिक विश्लेषण
शंकराचार्य लिखते हैं —
“शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजम् अजानतो भवति”
यह कथन अत्यन्त गम्भीर है।
१. मोह
मोह वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप से भिन्न देखना है। अनित्य को नित्य मानना, देह को आत्मा मानना, सुख को बाहरी वस्तुओं में खोजना — यही मोह है।
२. शोक
जब मोह के आधार पर निर्मित अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब शोक उत्पन्न होता है।
इस प्रकार —
अविद्या → मोह → कामना → कर्म → संसार → शोक
यह सम्पूर्ण संसार-चक्र है।
“कामकर्मबीजम्” — संसार की जड़
शंकराचार्य मोह और शोक को “काम” और “कर्म” का बीज बताते हैं।
मनुष्य पहले स्वयं को अपूर्ण मानता है। फिर वह बाहरी वस्तुओं में पूर्णता खोजता है। यही कामना है। कामना से कर्म उत्पन्न होते हैं, और कर्म से पुनर्जन्म तथा संसार का चक्र चलता रहता है।
अतः संसार की जड़ बाहरी जगत् नहीं, बल्कि आत्म-विस्मृति है।
आत्मज्ञान इस मूल भ्रान्ति को नष्ट कर देता है।
“गगनोपमं” — आत्मा की उपमा
शंकराचार्य आत्मा को “गगनोपम” कहते हैं — आकाश के समान।
आकाश —
· सबको धारण करता है,
· सबमें व्याप्त है,
· किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता।
इसी प्रकार आत्मा शरीर, मन, विचार और जगत् के सभी अनुभवों का आधार होते हुए भी उनसे अछूता रहता है।
यह उपमा अद्वैत वेदान्त की सूक्ष्मतम शिक्षाओं में से एक है।
शोक और मोह की असम्भवता
भाष्य का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है
“को मोहः कः शोकः”
यह केवल प्रश्न नहीं, बल्कि निषेध है।
शंकराचार्य कहते हैं कि यह वाक्य शोक और मोह की “असम्भवता” को प्रकट करता है।
जहाँ आत्मा सर्वत्र अनुभव हो रही है, वहाँ —
· किसी वस्तु के नष्ट होने का भय नहीं,
· किसी प्रिय के वियोग का दुःख नहीं,
· किसी दूसरे से स्पर्धा नहीं।
यह भावनाशून्यता नहीं, बल्कि ऐसी पूर्णता है जहाँ अभाव का अनुभव ही समाप्त हो जाता है।
संसार का अत्यन्त उच्छेद
शंकराचार्य लिखते हैं —
“सकारणस्य संसारस्य अत्यन्तमेव उच्छेदः”
अर्थात् संसार का कारण सहित पूर्ण उच्छेद।
यहाँ अद्वैत वेदान्त का मोक्ष-सिद्धान्त स्पष्ट होता है।
मोक्ष कोई स्वर्ग-प्राप्ति नहीं, न किसी स्थान की यात्रा। वह अविद्या और उसके समस्त कार्यों — मोह, शोक, कर्म, पुनर्जन्म — का समूल नाश है।
इसलिए आत्मज्ञान को केवल ज्ञान नहीं, “बंधन-निवृत्ति” कहा गया है।
आधुनिक सन्दर्भ में मन्त्र की प्रासंगिकता
आज का मनुष्य अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद गहरे मानसिक संकट से गुजर रहा है —
· अकेलापन
· अस्तित्वगत शून्यता
· भय
· अवसाद
· निरन्तर असन्तोष
उपनिषद् का यह मन्त्र इन समस्याओं की जड़ को पहचानता है — आत्म-विस्मृति।
जब मनुष्य स्वयं को केवल सीमित देह और व्यक्तित्व मानता है, तब संसार भय और संघर्ष का क्षेत्र बन जाता है। परन्तु आत्मैकत्व-दर्शन में अस्तित्व विभाजित नहीं रहता।
यही कारण है कि उपनिषद् की दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
ईशावास्योपनिषद् का सप्तम मन्त्र अद्वैत वेदान्त की परम परिणति का घोष है। यहाँ आत्मज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संसार-चक्र से पूर्ण मुक्ति का साधन है।
शंकराचार्य ने अपने भाष्य में स्पष्ट किया है कि मोह और शोक अविद्या के कार्य हैं। आत्मा के विशुद्ध, गगन-समान और एकरस स्वरूप का दर्शन होने पर उनका अस्तित्व असम्भव हो जाता है।
अतः यह मन्त्र मानव को बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की पहचान से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है। जहाँ सब कुछ आत्मा ही है, वहाँ न शोक शेष रहता है, न मोह — केवल अखण्ड, निर्विशेष और शुद्ध चैतन्य।
Mukesh ,,,,,,,,
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