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Wednesday, 20 May 2026

चित्तप्रसाद : भूख का चेहरा बनाता हुआ कलाकार — (गद्यात्मक फिक्शन)

चित्तप्रसाद : भूख का चेहरा बनाता हुआ कलाकार — (गद्यात्मक फिक्शन)

बरसात के बाद कीचड़ से भरी सड़क पर लोग जल्दी-जल्दी गुजर रहे थे। बाज़ार खुला था, दुकानें थीं, आवाज़ें थीं, लेकिन उसी भीड़ के किनारे एक आदमी चुपचाप पड़ा था। उसके शरीर पर केवल हड्डियाँ बची थीं। थोड़ी दूर एक बच्चा अपनी माँ की सूखी छाती से चिपका हुआ रो भी नहीं पा रहा था।

Chittaprosad Bhattacharya उन चेहरों को देख रहे थे। वे केवल दृश्य नहीं देख रहे थे; वे उस समय की नैतिक विफलता देख रहे थे।

उन्हें लगता था कि कला यदि अपने समय की पीड़ा को दर्ज नहीं करती, तो वह केवल सजावट बनकर रह जाती है।

बंगाल अकाल उनके भीतर किसी स्थायी घाव की तरह उतर गया था। उन्होंने भूख को आँकड़ों की तरह नहीं देखा। उन्होंने उसे सड़कों पर चलते हुए देखा, धीरे-धीरे मरते हुए देखा, बच्चों की आँखों में देखा।

उनके हाथ में कागज़ और स्याही थी। वे रंगों की भव्यता से दूर रहते थे। उनकी रेखाएँ तेज़ थीं, लगभग बेचैन। ऐसा लगता था जैसे वे जल्दी-जल्दी चित्र बना रहे हों, क्योंकि समय कम है और मरते हुए लोगों की संख्या बहुत अधिक।

एक माँ अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी है। बच्चा अब शायद जीवित नहीं है। लेकिन स्त्री की आँखों में आँसू भी नहीं बचे। चित्तप्रसाद उस क्षण को कागज़ पर उतार लेते हैं। बिना अलंकरण, बिना नाटकीयता।

उनके चित्रों में सुंदरता पारंपरिक अर्थों में नहीं मिलती। वहाँ भूख है, श्रम है, टूटे हुए शरीर हैं, थके हुए चेहरे हैं। लेकिन उसी के भीतर एक गहरी मानवीय करुणा भी है।

धीरे-धीरे उनकी कला प्रतिरोध का दस्तावेज़ बन गई। वे केवल कलाकार नहीं रहे; वे अपने समय के साक्षी बन गए।

उन्हें लगता था कि समाज कई बार सबसे अधिक क्रूर तब होता है जब वह पीड़ा को सामान्य मानने लगता है। कला का काम उस सामान्यीकृत क्रूरता को फिर से असहनीय बना देना है।

उन्होंने किसानों को चित्रित किया, मजदूरों को, आंदोलनों को, पुलिस की हिंसा को। लेकिन उनके चित्रों में नारे कम और मनुष्य अधिक दिखाई देता है।

एक मजदूर बैठा है। उसके हाथों में थकान है। उसके पीछे कोई बड़ा वैचारिक वाक्य नहीं लिखा। फिर भी पूरा चित्र व्यवस्था पर आरोप की तरह लगता है।

चित्तप्रसाद जानते थे कि चित्र दुनिया तुरंत नहीं बदलते। लेकिन वे यह भी जानते थे कि बिना गवाही के इतिहास और अधिक निर्दयी हो जाता है।

और शायद इसी कारण उनकी कला आज भी देखने पर केवल “पुरानी” नहीं लगती। उसमें आज का भूखा आदमी भी दिखाई देता है, आज का विस्थापित चेहरा भी।

उनकी रेखाएँ अब भी जैसे यही कहती हैं 
यदि मनुष्य की पीड़ा को देखने की क्षमता समाप्त हो जाए, तो सभ्यता केवल एक चमकदार आवरण रह जाती है।


Chittaprosad Bhattacharya (1915–1978, भारत) भारतीय चित्रकार, रेखांकन कलाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता थे।
वे बंगाल अकाल, मजदूर आंदोलनों और सामाजिक अन्याय पर आधारित अपने तीखे रेखाचित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं।
उनकी कला भारतीय जनजीवन, भूख और प्रतिरोध की महत्वपूर्ण दृश्य अभिव्यक्ति मानी जाती है।

मुकेश ,,,,,,,,,


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