वेदान्त और वैदिक साहित्य में मुक्ति के दो मार्ग : विहंगम मार्ग और पिप्पलादि मार्ग
भारतीय
दार्शनिक परम्परा में “मुक्ति” केवल
मृत्यु के उपरान्त प्राप्त
होने वाली कोई अलौकिक
अवस्था नहीं, बल्कि चेतना की परम स्वतंत्रता
है। वैदिक साहित्य, उपनिषद्, योग, वेदान्त और
तन्त्र—सभी में मनुष्य
की आध्यात्मिक यात्रा के विविध मार्गों
का वर्णन मिलता है। इन्हीं में
दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मार्ग हैं— विहंगम मार्ग और पिप्पलादि मार्ग।
ये दोनों मार्ग केवल साधना-पद्धतियाँ
नहीं हैं, बल्कि मानव-चेतना की दो भिन्न
गतियों और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों
के प्रतीक हैं। एक ओर
विहंगम मार्ग है—जो पक्षी
की भाँति तीव्र, प्रत्यक्ष, आकाशमार्गी और ज्ञानप्रधान है;
दूसरी ओर पिप्पलादि मार्ग
है—जो चींटी अथवा
वृक्षारोहिणी की तरह क्रमिक,
धैर्यपूर्ण, साधना-प्रधान और अनुभव-संचयी
है।
भारतीय
मनीषा ने इन दोनों
को विरोधी नहीं माना, बल्कि
साधक की प्रकृति, पात्रता
और संस्कारानुसार उपयुक्त माना है।
विहंगम
मार्ग : प्रत्यक्ष उड्डयन का पथ
“विहंगम”
शब्द “विहंग” अर्थात् पक्षी से बना है।
पक्षी वृक्ष की शाखाओं पर
क्रमशः नहीं चढ़ता; वह
सीधे उड़कर शिखर पर पहुँच
जाता है। इसी प्रकार
वह साधक जो तीव्र
वैराग्य, प्रखर विवेक और आत्मबोध की
क्षमता रखता है, वह
प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा सत्य को ग्रहण
करता है—यह विहंगम
मार्ग है।
यह मार्ग मुख्यतः अद्वैत वेदान्त, उपनिषदों की महावाक्य-परम्परा
तथा ज्ञानयोग में प्रतिष्ठित है।
(क)
उपनिषदों में विहंगम दृष्टि
उपनिषद्
बार-बार कहते हैं
कि ब्रह्म कोई दूर की
वस्तु नहीं है—
वह “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि”,
“अयमात्मा ब्रह्म” के रूप में
स्वयं साधक की आत्मा
में ही विद्यमान है।
विशेषतः
माण्डूक्य उपनिषद् में यह दृष्टि
अत्यन्त स्पष्ट है। वहाँ सम्पूर्ण
जगत् को केवल चैतन्य
की अभिव्यक्ति मानकर तुरिय अवस्था का प्रतिपादन किया
गया है। यहाँ साधना
क्रमिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष बोध है।
(ख)
शंकराचार्य और ज्ञान की आकस्मिकता
आदि
शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त
में मुक्ति का साधन “ज्ञान”
है। वे कहते हैं
कि अज्ञान हटते ही आत्मा
का स्वरूप स्वतः प्रकाशित हो जाता है;
जैसे सूर्य बादलों के हटते ही
प्रकट हो जाता है।
रस्सी-सर्प का उदाहरण
इसी का प्रतीक है—
सर्प को हटाना नहीं
पड़ता, केवल ज्ञान चाहिए
कि वह रस्सी है।
यहाँ
मुक्ति कोई “उत्पन्न” होने
वाली वस्तु नहीं, बल्कि स्वभाव की पहचान है।
यही विहंगम मार्ग का सार है।
विहंगम
मार्ग की विशेषताएँ
(1) तीव्रता
-यह मार्ग क्रमिक साधना की अपेक्षा प्रत्यक्ष
अनुभूति पर आधारित है।
(2) ज्ञान-प्रधानता -यहाँ कर्म गौण
और आत्मबोध प्रधान होता है।
(3) वैराग्य
की अनिवार्यता -जिसके भीतर संसार के
प्रति गहन अनासक्ति नहीं
है, उसके लिए यह
मार्ग कठिन है।
(4) गुरु-कृपा और श्रवण-मनन -महावाक्यों का श्रवण, उन
पर मनन और आत्मनिष्ठ
ध्यान इसकी आधारभूमि है।
पिप्पलादि मार्ग : क्रमिक साधना का पथ
“पिप्पलादि”
शब्द की व्युत्पत्ति को
लेकर विभिन्न मत हैं, पर
सामान्यतः इसे उस क्रमिक
गति का प्रतीक माना
गया है जिसमें साधक
धीरे-धीरे साधना के
सोपानों को पार करता
है।
यह मार्ग उस चींटी की
भाँति है जो वृक्ष
पर धीरे-धीरे चढ़ती
है। वह एक ही
छलाँग में शिखर पर
नहीं पहुँचती, किन्तु धैर्यपूर्वक निरन्तर आगे बढ़ती रहती
है।
यह मार्ग योग, उपासना, तप,
ब्रह्मचर्य, कर्मयोग और ध्यान की
क्रमिक साधना से सम्बद्ध है।
(क)
प्रश्नोपनिषद् और पिप्पलाद ऋषि
प्रश्नोपनिषद्
में महर्षि पिप्पलाद के आश्रम का
उल्लेख आता है। वहाँ
शिष्य तत्काल उत्तर नहीं पाते; पहले
उन्हें तप, ब्रह्मचर्य और
श्रद्धा सहित एक वर्ष
तक साधना करनी पड़ती है।
यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संकेत है—
ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना
नहीं, बल्कि पात्रता का फल है।
यहाँ
मार्ग क्रमिक है :
संयम → तप → उपासना → प्रश्न
→ अनुभूति।
पिप्पलादि
मार्ग की विशेषताएँ
(1) क्रमिक
विकास -साधक धीरे-धीरे
अन्तःकरण की शुद्धि करता
है।
(2) कर्म
और उपासना का महत्त्व -यहाँ यज्ञ, तप,
जप, ध्यान, सेवा और योग—सबका स्थान है।
(3) मनोवैज्ञानिक
परिपक्वता -यह मार्ग साधक
को भीतर से परिपक्व
बनाता है।
(4) व्यापकता
-सामान्य गृहस्थ और सामाजिक जीवन
जीने वाले अधिकांश लोगों
के लिए यह मार्ग
अधिक उपयुक्त माना गया है।
दोनों मार्गों का दार्शनिक अन्तर
|
आधार |
विहंगम
मार्ग |
पिप्पलादि
मार्ग |
|
गति |
तीव्र |
क्रमिक |
|
साधन |
ज्ञान |
साधना
एवं उपासना |
|
प्रतीक |
पक्षी |
चींटी
/ क्रमिक आरोहण |
|
उपयुक्त
साधक |
तीव्र
वैराग्यवान |
सामान्य
साधक |
|
केन्द्र |
आत्मबोध |
अन्तःकरण-शुद्धि |
|
स्वरूप |
प्रत्यक्ष
अद्वैत |
साधनात्मक
प्रगति |
क्या
दोनों मार्ग विरोधी हैं?
भारतीय
दर्शन का सौन्दर्य यही
है कि वह किसी
एक पद्धति को अंतिम नहीं
मानता।
वास्तव
में ये दोनों मार्ग
एक ही यात्रा के
दो आयाम हैं। बहुत
बार पिप्पलादि मार्ग की दीर्घ साधना
अन्ततः विहंगम अनुभूति में परिणत होती
है।
योगशास्त्र
में चित्तशुद्धि के बाद समाधि
आती है; भक्ति में
प्रेम की परिपक्वता के
बाद आत्मविस्मृति होती है; कर्मयोग
में निष्कामता के बाद ज्ञान
उदित होता है।
अतः
क्रमिकता अन्ततः आकस्मिक बोध का मार्ग
प्रशस्त करती है।
आधुनिक
सन्दर्भ में इन मार्गों की प्रासंगिकता
आज का मनुष्य सूचना
से भरा हुआ है,
परन्तु अन्तःकरण से विखण्डित है।
ऐसे समय में विहंगम
मार्ग की “प्रत्यक्ष जागृति”
और पिप्पलादि मार्ग की “अनुशासित साधना”—दोनों की आवश्यकता है।
केवल
बौद्धिक अद्वैत प्रायः जीवन में अहंकार
उत्पन्न कर सकता है,
जबकि केवल कर्मकाण्ड व्यक्ति
को यांत्रिक बना सकता है।
भारतीय परम्परा इन दोनों के
समन्वय की बात करती
है।
विहंगम
मार्ग और पिप्पलादि मार्ग
भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन की दो गहन
धाराएँ हैं। एक कहता
है—
“तुम अभी और इसी
क्षण ब्रह्म हो।”
दूसरा
कहता है—
“अपने को उस सत्य
के योग्य बनाओ।”
एक आकाश की उड़ान
है, दूसरा पृथ्वी का धैर्य।
एक विद्युत् की चमक है,
दूसरा दीपक की क्रमिक
ज्योति।
किन्तु
दोनों का लक्ष्य एक
ही है—
मानव को उसके सीमित
अहं से उठाकर उस
अनन्त चैतन्य में प्रतिष्ठित करना
जिसे उपनिषद् “ब्रह्म” कहते हैं।
मुकेश ,,,
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