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Friday, 22 May 2026

उपस्थिति की छायाएँ - उपस्थिति का अंत नहीं होता

 लखनऊ की साउथ सिटी में उस दिन सुबह थोड़ी अलग थी।

हवा में हल्की नमी थी, और आसमान बिल्कुल साफ़ नहीं था — जैसे बादलों ने पूरी तरह जाने का फैसला नहीं किया हो, बस रुककर देख रहे हों।

वही बंगला अब भी था।

गेट अब भी बंद रहता था।

पाम के पेड़ अब भी खड़े थे — मगर इस बार उनकी छाया थोड़ी बदल गई थी, जैसे समय ने उन्हें थोड़ा और लंबा कर दिया हो।

झूला अब भी था।

लेकिन उसमें अब कोई हलचल नहीं थी।

लोग कहते थे कि वह स्त्री लौट आई है।

या शायद कभी गई ही नहीं थी — बस कुछ समय के लिए दिखाई देना बंद हो गई थी।

नौकर ने बताया कि सुबह फिर से चाय की केतली रखी गई थी।
बाग़ में पौधों को पानी दिया गया था।
और किसी ने धीरे-धीरे झूले को थोड़ा-सा हिलाया था।

पर कोई उसे साफ़ तौर पर देख नहीं पाया था।

बस संकेत थे।

जैसे किसी उपस्थिति ने अपने लौटने का शोर नहीं किया हो, केवल अपनी आदतें छोड़ दी हों।

उस दिन मैं फिर वहाँ पहुँचा।

गेट पहले से थोड़ा खुला था।

और भीतर एक अजीब-सी शांति थी — वही पुरानी शांति, लेकिन इस बार उसमें एक हल्का-सा कंपन था।

झूला हिल रहा था।

बहुत धीरे।

जैसे कोई अभी-अभी बैठा हो और हवा से बात कर रहा हो।

मैं अंदर नहीं गया।

बस बाहर से देखता रहा।

और तभी वह दिखी।

छत पर नहीं।
बाग़ में भी नहीं।

बल्कि झूले पर।

बहुत हल्के से बैठी हुई।

वही चेहरा।
वही डिम्पल।
वही शांत आँखें।

लेकिन इस बार उसमें कोई निश्चितता नहीं थी।

जैसे वह लौटकर भी पूरी तरह नहीं लौटी हो।

वह चाय पी रही थी।

बहुत धीरे।

और बिल्ली उसके पास थी — इस बार सचमुच वहाँ थी।

उसने मुझे देखा।

इस बार मुस्कान थोड़ी अलग थी।

डिम्पल थे, लेकिन उनमें वह पुरानी दूरी नहीं थी।

मैंने पूछा —
“आप काशी गई थीं?”

वह हल्के से मुस्कुराई।

“मैं कहीं नहीं गई थी।”

उसका स्वर बहुत शांत था।

जैसे यह वाक्य किसी स्पष्टीकरण के लिए नहीं, बल्कि किसी भ्रम को धीरे से हटाने के लिए था।

मैं चुप रहा।

उसने झूले की रस्सी पकड़ ली।

“लोग अक्सर यह समझ लेते हैं कि जो दिखाई नहीं देता, वह चला गया है।”

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

“लेकिन कुछ चीज़ें केवल दृष्टि से बाहर जाती हैं… अस्तित्व से नहीं।”

उस दिन पहली बार मुझे लगा कि वह पहले जैसी नहीं है।

न पूरी तरह उपस्थित, न पूरी तरह अनुपस्थित।

जैसे कोई बीच की अवस्था में खड़ा हो —
जहाँ मनुष्य को समझना नहीं, सिर्फ़ स्वीकार करना पड़ता है।

बाग़ में हवा चली।

पाम के पत्ते हल्के-से हिले।

झूला थोड़ा और धीरे-धीरे हिला।

और बिल्ली वहीं बैठी रही — जैसे उसे इस दुनिया के बदलने या न बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

मैं बाहर निकल आया।

गेट अपने आप धीरे-धीरे बंद हो गया।

और उस बंद होते गेट के साथ मुझे पहली बार समझ आया कि कुछ जीवन कहानियाँ नहीं होते।

वे केवल बार-बार बदलती हुई उपस्थिति होते हैं 
जो कभी पूरी तरह जाते नहीं,
और कभी पूरी तरह मिलते भी नहीं।    

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