(बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)
रदीफ़: “में कहीं”
क़ाफ़िया: पुरानी / रवानी / कहानी / निशानी / जवानी / वीरानी / पानी
दिल भटकता ही रहा याद पुरानी में कहीं,
आग जलती ही रही आँख के पानी में कहीं।
रात ठहरी थी तेरे नाम की ख़ुशबू लेकर,
चाँद डूबा था किसी ख़्वाब-कहानी में कहीं।
तेरी आवाज़ का जादू भी अजब था जानाँ,
रूह बहती ही रही इश्क़-रवानी में कहीं।
मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया दिल में,
ज़ख़्म पलते ही रहे अश्क के पानी में कहीं।
तेरे जाने से मिरी रूह बहुत वीराँ थी,
फिर भी इक नूर बचा तेरी निशानी में कहीं।
उम्र ढलती गई तन्हा कई सहराओं में,
दिल धड़कता ही रहा अपनी जवानी में कहीं।
हमने ख़ामोश मोहब्बत को इबादत समझा,
नाम तेरा ही रहा दिल की अज़ानी में कहीं।
'मुकेश' इश्क़ की राह में क्या-क्या न सहा है हमने,
रूह जलती ही रही दर्द की रवानी में कहीं।
मुकेश,,,,,,,,,,,
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