(बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)
रदीफ़: “में कहीं”
क़ाफ़िया: पानी / रवानी / कहानी / निशानी / जवानी / वीरानी
चाँद उतरा था तेरी आँख के पानी में कहीं,
रूह भीगती रही इश्क़ की रवानी में कहीं।
रात ख़ामोश थी, तारों की चमक थी लेकिन,
दिल भटकता रहा इक याद पुरानी में कहीं।
तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी महकती थी अभी,
कोई आहट थी छुपी रात सुहानी में कहीं।
मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया दिल में,
आग जलती ही रही आँख के पानी में कहीं।
तेरे जाने से मिरी रूह बहुत वीराँ थी,
फिर भी इक नूर बचा तेरी निशानी में कहीं।
हमने तन्हाई को हमराज़ बना रक्खा था,
ज़िंदगी हँसती रही फिर भी उदासी में कहीं।
'मुकेश' इश्क़ की राह में क्या-क्या न गुज़रना पड़ा,
उम्र ढलती ही रही ख़्वाब जवानी में कहीं।
मुकेश,,,,,,,,,,,,,,
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