बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)
रदीफ़: “थी जानाँ”
क़ाफ़िया: अजब / शब / तलब / ग़ज़ब / सब / अदब
तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी अजब थी जानाँ,
देर तक रूह में बजती रही शब थी जानाँ।
तेरे मिलने की मेरे दिल को बहुत थी तलब,
मेरी साँसों में कोई जागती लब थी जानाँ।
चाँद उतरा था तेरी आँख के पानी में कहीं,
रात भीगी हुई इक ख़्वाब-ए-तरब थी जानाँ।
मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया लेकिन,
तेरी ख़ामोश नज़र सबसे ग़ज़ब थी जानाँ।
तेरी यादों का धुआँ दिल से निकलता ही न था,
मेरे अंदर कोई जलती हुई शब थी जानाँ।
तेरे जाने से भी रिश्ता न मिरा टूट सका,
तेरी मौजूदगी हर मोड़ पे सब थी जानाँ।
'मुकेश' इश्क़ में हमने यही बात समझ ली आख़िर,
जो भी सच्ची थी मोहब्बत, वही रब थी जानाँ।
मुकेश,,,,,
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