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Wednesday, 6 May 2026

रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,

 बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “राहों में”
क़ाफ़िया: ख़ौफ़ / चाँद / गर्द / दर्द / अश्क / गर्द की ध्वनि-संगति के साथ


रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,
हमने इक चाँद को फिर भी रखा राहों में।

दूर तक कोई भी अपना न नज़र आया मगर,
जलते रहते थे कई ख़्वाब सदा राहों में।

धूल ऐसी थी कि चेहरों का पता खो जाए,
हमने फिर भी तिरे क़दमों को पढ़ा राहों में।

हर तरफ़ दर्द की दीवार खड़ी थी लेकिन,
ढूँढ़ ही ली कोई उम्मीद नई राहों में।

तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी अजब थी जानाँ,
देर तक गूँजती रहती थी हवा राहों में।

हमने तन्हाई को हमराज़ बना कर अक्सर,
अपने ही दिल का दिया ख़ुद ही रखा राहों में।

मक़ता:
'मुकेश' इतना अँधेरों से गुज़रना था कठिन,
फिर भी इक नूर-सा मिलता रहा राहों में।

मुकेश,,,,,,,,,,,,


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