उम्र भर दर्द की मिट्टी में गुज़र कर देखा,
तब कहीं ख़ुद को अँधेरों से उभर कर देखा।
जो भी अपने थे वही दूर खड़े थे मुझसे,
मैंने हर रिश्ते को नज़दीक से कर देखा।
तेरी यादों की तपिश कम तो नहीं थी फिर भी,
दिल ने हर ज़ख़्म को चुपचाप ही भर कर देखा।
मैंने तन्हाई के जंगल में भटक कर अक्सर,
अपने साये को भी कुछ देर ठहर कर देखा।
वक़्त ने छीन लिए मुझसे कई रंग मगर,
मैंने हर दर्द को अशआर में ढल कर देखा।
रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,
फिर भी उम्मीद का इक चाँद उतर कर देखा।
'मुकेश' अपने ही अंदर जो सफ़र था मुश्किल,
ख़ुद को हर मोड़ पे टूटे हुए सर कर देखा।
मुकेश ,,,,,,
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