होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Wednesday, 6 May 2026

धूप ने छीन लिया मुझसे मेरे ख़्वाबों का रंग,

 


धूप ने छीन लिया मुझसे मेरे ख़्वाबों का रंग,

अब तो बारिश भी लिए फिरती है तेज़ाबों का रंग।


वक़्त की धूल ने चेहरों को बदल डाला यूँ,

अब न आँखों में रहा पहले से अहबाबों का रंग।


तेरी यादों ने मेरी रात को ऐसा रंगा,

चाँद फीका लगे, गहरा हो तेरे ख़्वाबों का रंग।


मैंने सच बोल के रिश्तों को बचाना चाहा,

लोग समझे मिरे लहजे में है आदाबों का रंग।


उम्र भर दर्द की मिट्टी में गुज़र कर देखा,

तब कहीं आके मिला रूह को महताबों का रंग।


'मुकेश' अब भी मिरी रूह में ज़िंदा है कहीं,

धूप से जल के भी बाक़ी है कई ख़्वाबों का रंग।


मुकेश ,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment