(एक आन्तरिक एकालाप — २)
कभी-कभी
मुझे लगता है
मैं अब मनुष्य कम,
अपनी ही स्मृतियों का संग्रहालय ज़्यादा हूँ।
लोग आते हैं,
मुझसे बातें करते हैं,
और लौट जाते हैं,
लेकिन भीतर
कुछ पुरानी चीज़ें
अब भी शीशों के पीछे रखी हुई हैं—
एक आवाज़,
एक अधूरी हँसी,
किसी के चलते हुए पैरों की धीमी ध्वनि।
मैं उन्हें छू नहीं सकता।
समय ने
सब कुछ पुरातत्त्व बना दिया है।
अब प्रेम भी
घटना नहीं,
उत्खनन लगता है।
मैं अपने भीतर
धीरे-धीरे खुदाई करता हूँ
और हर बार
कोई टूटा हुआ अवशेष मिल जाता है
एक वाक्य,
एक स्पर्श,
या किसी शाम का रंग।
फिर मैं बहुत देर तक सोचता हूँ
क्या मनुष्य सचमुच वर्तमान में जीता है?
या वह
बीते हुए समय के मलबे पर
अपना आज खड़ा करता है?
रात में
जब सारी आवाज़ें सो जाती हैं,
मेरे भीतर
एक दूसरी दुनिया जागती है।
वहाँ
कोई अब भी जीवित है।
कोई अब भी मुझे पुकारता है।
कोई अब भी
मेरे लौट आने की प्रतीक्षा करता है।
और मैं
हर सुबह
अपनी ही चेतना से निर्वासित होकर
फिर इस दुनिया में लौट आता हूँ।
यह लौटना
जीवन कहलाता है शायद।
हालाँकि
मैं जानता हूँ,
मनुष्य एक ही बार नहीं मरता।
उसके भीतर
धीरे-धीरे
अनेक मृत्युयाँ घटित होती रहती हैं।
किसी विश्वास की मृत्यु।
किसी प्रतीक्षा की।
किसी आत्मीय संबोधन की।
और अंत में
जो बचा रह जाता है,
वह आदमी नहीं,
उसकी थकी हुई प्रतिध्वनि होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment