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Saturday, 16 May 2026

अनुपस्थिति का भूगोल

 अनुपस्थिति का भूगोल

(एक आन्तरिक एकालाप)

अब जबकि

तुम्हारी दुनिया से

एक आवाज़ कम हो गई है,

तुम्हें पता चल रहा है

कि ध्वनि भी

मनुष्य के रहने की जगह होती है।


पहले

तुम्हें लगता था

घर दीवारों से बनता है,

अब समझ में आता है

कुछ लोगों की उपस्थिति

ईंटों से ज़्यादा ठोस होती है।


तुम पानी पीते हो

और अचानक रुक जाते हो,

क्योंकि याद आता है

कोई इसी गिलास को

एक विशेष ढंग से पकड़ता था।


देखो,

मृत्यु कितनी सूक्ष्म चोर है

वह सिर्फ़ मनुष्य को नहीं ले जाती,

वह वस्तुओं से उनका अर्थ भी चुरा लेती है।


अब कुर्सियाँ

बैठने की जगह नहीं रहीं,

वे रिक्तता की आकृतियाँ हैं।

दरवाज़े

आवागमन नहीं,

वापस न लौट पाने की घोषणाएँ हैं।


तुम्हें कहा जाएगा

स्वीकार करो।

समय के साथ सब सामान्य हो जाएगा।

लेकिन “सामान्य” क्या होता है?

क्या वह स्थिति

जहाँ आदमी रोना बंद कर दे?

या वह

जहाँ भीतर का मरुस्थल

इतना पुराना हो जाए

कि उसकी रेत

पैरों को जलाना छोड़ दे?


तुम्हारे भीतर

अब दो व्यक्ति रहते हैं

एक

जो दुनिया से बात करता है,

और दूसरा

जो हर रात

अँधेरे में बैठकर

अनुपस्थिति की राख टटोलता है।


कभी-कभी

तुम्हें लगता है

दुख कोई भावना नहीं,

एक पूरा स्थापत्य है।

उसके गलियारे हैं,

सीलन भरी दीवारें हैं,

और एक लंबी सीढ़ी

जो लगातार नीचे उतरती जाती है।


तुम उसी में रहते हो अब।


और सबसे विचित्र यह है

कि मनुष्य

हर असहनीय चीज़ के साथ भी

धीरे-धीरे जीना सीख लेता है।


जैसे

कटा हुआ वृक्ष

अपनी अनुपस्थित शाखाओं के साथ

बरसों खड़ा रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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