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Sunday, 24 May 2026

लोगों को अपने पुराने पछतावे जमा कराने होंगे।

 उस वर्ष

सरकार ने निर्णय लिया
कि अब लोगों को
अपने पुराने पछतावे जमा कराने होंगे।

शहर के बीचोंबीच
एक विशाल भवन बनाया गया —
“राष्ट्रीय पछतावा भंडार।”

लोग नम्बर लेकर भीतर जाते,
और काउंटर पर बैठा कर्मचारी पूछता :

“व्यक्तिगत पछतावा
या पारिवारिक?”

कुछ लोग
छोटे-छोटे पछतावे लाए थे :
किसी भूखे कुत्ते को पत्थर मारना,
पिता की अंतिम कॉल न उठाना,
किसी प्रेमपत्र का उत्तर न देना।

लेकिन कुछ पछतावे इतने बड़े थे
कि उन्हें ट्रकों में लाना पड़ा।

एक आदमी
पूरा कमरा भर पछतावा लाया —
उसकी बेटी वर्षों पहले घर छोड़ गई थी,
और उसने कभी उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

कर्मचारी ने फॉर्म भरते हुए पूछा :
“क्या आप इसे स्थायी रूप से त्यागना चाहते हैं?”

आदमी बहुत देर चुप रहा।

फिर बोला :
“नहीं…
बस थोड़ा हल्का करना चाहता हूँ।”

भवन के तहखाने में
हज़ारों पछतावे रखे थे।

कुछ से
हल्की सिसकियों जैसी आवाज़ आती थी,
कुछ बिल्कुल शांत थे,
और कुछ
इतने पुराने हो चुके थे
कि पत्थर जैसे लगने लगे थे।

रात की ड्यूटी करने वाले चौकीदार कहते थे
कि तीन बजे के बाद
पूरा तहखाना
धीरे-धीरे साँस लेने लगता है।

एक सुबह
अख़बार में खबर छपी :

“भंडार की एक दीवार में दरार मिली है।”

उस दिन
पूरे शहर में
लोग अचानक उदास हो गए।

कई लोगों ने
उन गलतियों के लिए माफ़ी माँगी
जिन्हें वे वर्षों से भूल चुके थे।

और कुछ ने
बिना कारण
पुराने नम्बर मिलाने शुरू कर दिए।

जैसे
दरार से निकलकर
पछतावे
फिर से अपने मालिकों को खोजने लगे हों।

— मुकेश

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