नगर निगम ने घोषणा की
कि इस वर्ष
शहर की अतिरिक्त उदासी को
नदी में बहा दिया जाएगा।
सुबह से ही
लम्बी कतारें लग गईं।
लोग छोटे-छोटे डिब्बों में
अपनी उदासी भरकर लाए थे —
किसी के डिब्बे में
पुरानी तस्वीरों की गन्ध थी,
किसी में
अधूरी पढ़ी किताबों की धूल,
किसी में
वह आख़िरी वाक्य
जो कभी कहा नहीं गया।
सरकारी कर्मचारी
मेज़ पर बैठकर
उदासियों का वज़न कर रहे थे।
“यह बहुत पुरानी है,”
एक ने कहा,
“इसे अलग रखो,
इसमें बचपन मिला हुआ है।”
एक बूढ़ी औरत
अपनी उदासी खोलकर रोने लगी।
अंदर
एक छोटा-सा नीला स्वेटर था
जिसे उसने
चालीस साल से नहीं छुआ था।
एक आदमी
अपनी उदासी जमा कराने आया,
लेकिन आख़िरी क्षण में
उसे वापस जेब में रख लिया।
शायद कुछ दुख
मनुष्य छोड़ना नहीं चाहता,
क्योंकि उन्हीं से
उसे पता चलता है
कि वह अब भी जीवित है।
शाम तक
पूरा ट्रक भर चुका था।
उदासियाँ
बोरों में बन्द
धीरे-धीरे नदी की ओर ले जाई गईं।
लेकिन उसी रात
शहर के ऊपर
एक अजीब भारीपन उतर आया।
लोग सो नहीं सके।
खिड़कियाँ बार-बार खुलती रहीं।
कुत्ते बिना वजह भौंकते रहे।
और अगली सुबह
नदी का पानी
हल्का नमकीन पाया गया।
— मुकेश
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