रात की आख़िरी चाय
(हेमिंग्वे की शैली से प्रेरित)
ढाबा लगभग खाली था।
रात बहुत आगे बढ़ चुकी थी।
एक आदमी
खिड़की के पास बैठा
धीरे-धीरे चाय पी रहा था।
चाय अब ठंडी हो गई थी,
लेकिन वह फिर भी कप हाथ में लिए रहा
जैसे कुछ चीज़ें
स्वाद के लिए नहीं,
साथ के लिए पकड़ी जाती हैं।
बाहर हाईवे पर
ट्रकों की रोशनियाँ
कभी-कभी अँधेरे को काटती हुई निकल जातीं।
उसने जेब से पुरानी रसीद निकाली।
पीछे किसी का नंबर लिखा था।
स्याही हल्की पड़ चुकी थी।
उसने कुछ क्षण उसे देखा,
फिर मोड़कर वापस रख लिया।
ढाबे वाला ऊँघ रहा था।
रात में जागते हुए लोग
अक्सर एक-दूसरे से सवाल नहीं पूछते।
आदमी ने आख़िरी घूँट पिया।
उसे अचानक लगा —
ज़िंदगी में बहुत-सी चीज़ें
समाप्त नहीं होतीं,
वे बस
धीरे-धीरे उपयोग में आना बंद हो जाती हैं।
जैसे पुराने नंबर।
पुरानी जगहें।
पुराने वादे।
उसने पैसे मेज़ पर रखे
और बाहर आ गया।
हवा ठंडी थी।
सड़क लंबी थी
और लगभग खाली।
वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा,
फिर बिना किसी जल्दी के
चलने लगा।
जैसे उसे कहीं पहुँचना नहीं था
सिर्फ़ चलते रहना था।
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