आत्मा का उत्खनन
(एक आन्तरिक एकालाप)
मैंने एक दिन
अपने भीतर उतरने की कोशिश की।
वैसे नहीं
जैसे लोग ध्यान में उतरते हैं,
या प्रार्थना में
बल्कि
जैसे कोई पुरातत्त्ववेत्ता
सदियों पुरानी मिट्टी हटाता है
धीरे-धीरे,
सावधानी से,
डरते हुए।
क्योंकि भीतर
जो दबा होता है,
वह हमेशा मृत नहीं होता।
मैंने
अपने ही मन की सतह पर
बहुत-सी सभ्यताएँ देखीं—
कुछ उजड़ी हुई,
कुछ आधी जली हुई,
कुछ अब भी
अपने अंतिम धुएँ के साथ जीवित।
एक परत हटाई
तो बचपन मिला
भीगी हुई दोपहरें,
अधखुले दरवाज़े,
और बिना कारण रो पड़ने वाली एक मासूम उदासी।
दूसरी परत में
प्रेम था।
टूटा हुआ,
लेकिन अब भी गर्म।
जैसे
किसी पुराने नगर के खंडहरों में
अचानक एक दीपक जलता मिल जाए।
फिर
और नीचे जाने पर
भय मिला।
इतना पुराना
कि उसका कोई चेहरा नहीं था।
शायद
मनुष्य जन्म से नहीं डरता,
वह धीरे-धीरे
दुनिया को समझते हुए डरना सीखता है।
मैंने देखा—
मेरे भीतर
कितने लोग दबे पड़े हैं।
वह बच्चा
जो कभी कुछ बनना चाहता था।
वह युवक
जो प्रेम को शाश्वत मानता था।
वह आदमी
जिसने दुनिया से समझौते किए।
वे सब
अब भी कहीं मौजूद हैं,
बस
एक-दूसरे की परतों के नीचे।
तब समझ आया
कि मनुष्य
एक जीवन नहीं जीता।
उसके भीतर
अनेक जीवन
एक साथ दफ़्न रहते हैं।
और आत्मा—
वह कोई उजली, पवित्र चीज़ भर नहीं,
वह एक विशाल भूगर्भ है
जहाँ स्मृतियाँ, इच्छाएँ, अपराधबोध, प्रेम और शोक
हज़ारों वर्षों की मिट्टी की तरह जमा रहते हैं।
शायद इसी कारण
कभी-कभी
एक मामूली-सी आवाज़,
एक गंध,
या कोई पुराना गीत
अचानक हमें भीतर तक तोड़ देता है।
क्योंकि वह
सिर्फ़ स्मृति नहीं जगाता,
वह हमारे भीतर दबी हुई
किसी पूरी सभ्यता को जगा देता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment