सैयद हैदर रज़ा : बिंदु में लौटता हुआ आदमी — (गद्यात्मक फिक्शन)
बहुत वर्षों तक शहरों, रंगों और परिदृश्यों को चित्रित करने के बाद एक दिन S. H. Raza अचानक एक छोटे-से काले बिंदु के सामने रुक गए।
वह केवल एक आकृति नहीं थी।
उन्हें लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड उसी में सिमट आया हो।
रज़ा ने यूरोप देखा था।
आधुनिक कला देखी थी।
रंगों की अनगिनत संभावनाएँ देखी थीं।
लेकिन जितना बाहर गए, उतना भीतर लौटने लगे।
उनकी शुरुआती पेंटिंग्स में जंगल थे, गाँव थे, नदियाँ थीं।
मध्यप्रदेश की स्मृतियाँ थीं।
बारिश के बाद की मिट्टी का रंग था।
लेकिन धीरे-धीरे दृश्य गायब होने लगे।
पेड़ एक आकृति में बदल गया।
धरती एक रंग में।
और अंततः सब कुछ एक बिंदु की ओर लौटने लगा।
रज़ा को लगता था कि भारतीय चिंतन में “बिंदु” केवल ज्यामिति नहीं है।
वह ऊर्जा का केंद्र है।
शून्य भी, और सृष्टि का आरम्भ भी।
एक बच्चा कागज़ पर गोल काला बिंदु बनाता है।
लोग उसे साधारण समझते हैं।
लेकिन रज़ा उसी बिंदु में ध्यान की गहराई देखते थे।
उनकी कला में रंग धीरे-धीरे आध्यात्मिक हो गए।
लाल केवल लाल नहीं रहा।
वह अग्नि भी था, जीवन भी, चेतना भी।
नीला आकाश से आगे बढ़कर मौन का रंग बन गया।
उन्हें लगता था कि आधुनिक मनुष्य बाहर की दुनिया में इतना खो गया है कि उसने अपने भीतर के केंद्र से संबंध खो दिया है।
इसलिए उनकी पेंटिंग्स कई बार चित्र से अधिक ध्यान जैसी लगती हैं।
एक कैनवास पर केवल रंग, वृत्त और आकृतियाँ हैं।
फिर भी उसे देखते हुए भीतर कोई धीमी शांति उतरने लगती है।
रज़ा शायद यही चाहते थे
कि कला केवल आँखों से न देखी जाए,
भीतर भी महसूस की जाए।
धीरे-धीरे
उनकी चित्रकला यात्रा बाहर की प्रकृति से भीतर की चेतना तक पहुँच गई।
और अंत में,
वे किसी परिदृश्य में नहीं रहे
वे उस छोटे-से बिंदु में रह गए
जहाँ मनुष्य पहली बार
अपने भीतर के मौन को देखता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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