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Saturday, 23 May 2026

आठ आने

 आठ आने

अब सोचता हूँ तो लगता है कि बचपन के अधिकांश मित्र वास्तव में मित्र नहीं, समय के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जो किसी पुराने कमरे की दीवारों की तरह भीतर बने रहते हैं। हम उन्हें वर्षों तक याद नहीं करते, लेकिन एक दिन अचानक कोई गंध, कोई आवाज़, या किसी खेल का दृश्य उन्हें फिर जीवित कर देता है।

वह लड़का भी अब इसी तरह लौटता है।

कभी पान की गंध के साथ।

कभी किसी खाली मैदान में खेलते बच्चों को देखकर।

कभी किसी पुरानी शाम की धूल में।

हम साथ पढ़ते थे। प्राथमिक विद्यालय के वे वर्ष, जिनमें जीवन अभी बहुत छोटा और दुनिया बहुत बड़ी लगती थी। स्कूल तक जाने वाली सड़क कच्ची थी। बरसात में कीचड़ भर जाता और गर्मियों में धूल उड़ती रहती। हम लोग बस्ते पीठ पर नहीं, अक्सर हाथ में लटकाकर चलते थे। रास्ते में इमली का एक पेड़ पड़ता था जिसके नीचे लड़के अक्सर गिल्ली-डंडा खेलते मिल जाते।


उन्हीं लड़कों में वह सबसे अलग दिखाई देता था।

दुबला-पतला।

घुटनों से ऊपर चढ़ी हुई फीकी निकर।

हमेशा धूल से सने पैर।

लेकिन गिल्ली-डंडा उसके हाथ में पहुँचते ही खेल अचानक खेल नहीं रहता था। उसमें एक अजीब-सी तन्मयता आ जाती। वह पहले जमीन पर झुककर गिल्ली को ठीक करता, फिर डंडे को हथेली पर दो-तीन बार घुमाता और उसके बाद जिस सफाई से गिल्ली को उछालकर मारता, वह हम सबको चकित कर देता। गिल्ली इतनी दूर जाती कि कई बार छोटे लड़के उसे खोजते-खोजते थक जाते।


उस समय उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास आ जाता था जो स्कूल में कभी दिखाई नहीं देता था।


पढ़ाई में वह बहुत कमजोर था।

इतना कि अध्यापक कई बार उसे उदाहरण बनाकर डाँटते। उसकी कॉपियाँ हमेशा अधूरी रहतीं। गणित के सवाल गलत। वर्तनी टूटी हुई। उसे पाठ याद नहीं होते थे। लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि वह पढ़ाई से डरता नहीं था; बस किताबों की दुनिया उसके लिए बनी ही नहीं थी।

उसके पिता मोहल्ले के मोड़ पर पान की छोटी-सी गुमटी चलाते थे। शाम के समय वहाँ हमेशा कुछ लोग खड़े रहते। बीड़ी का धुआँ, कत्थे की गंध और पीली बल्ब की रोशनी — वही उसकी दुनिया थी।

एक वर्ष वह फिर फेल हो गया।

उसके बाद अचानक उसने स्कूल आना बंद कर दिया।

बाद में पता चला कि उसके पिता ने कह दिया था — “अब बहुत पढ़ लिया। दुकान पर बैठो।”

उस समय यह बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई थी। बचपन में हमें लगता है कि जो लोग रोज दिखाई देते हैं, वे हमेशा वैसे ही बने रहेंगे। लेकिन कुछ बच्चों का बचपन बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।

शाम को जब हम खेलने जाते, वह गुमटी पर बैठा दिखाई देता। सामने रखे डिब्बों में सुपारी भरता, पान पर चूना लगाता, पैसे गिनता। उसके हाथों में अब हमेशा कत्थे का हल्का लालपन लगा रहता।

फिर भी, जब कभी ग्राहक कम होते, वह दुकान से निकलकर थोड़ी देर हमारे साथ गिल्ली-डंडा खेलने आ जाता। और उन कुछ मिनटों में उसका चेहरा फिर वही पुराना लड़के वाला चेहरा हो जाता।

मुझे वह दिन बहुत साफ़ याद है जब हम लोगों ने मोहल्ले की क्रिकेट टीम बनाने की ठानी थी। क्रिकेट तब हमारे लिए किसी बड़े सपने जैसा खेल था। नई गेंद खरीदने के लिए चंदा इकट्ठा किया जा रहा था। दो आने, चार आने, जो जिसके घर से मिल सके।

मेरे पास पैसे नहीं थे।

मैं कई लड़कों के साथ खड़ा था लेकिन भीतर एक अजीब-सी शर्म थी। उस उम्र में गरीबी का दुख उतना नहीं होता जितना दूसरों के सामने उसके दिखाई देने का।

वह उस समय गुमटी पर बैठा था।

उसने शायद मेरी झिझक देख ली थी।

कुछ देर बाद उसने जेब में हाथ डाला और आठ आने निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए।

आठ आने उस समय मेरे लिए बहुत बड़ी रकम थी।

मैंने तुरंत कहा — “बाद में लौटा दूँगा।”

उसने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा — “ठीक है।”

लेकिन उस “ठीक है” में भी मुझे मालूम हो गया था कि वह पैसे वापस नहीं लेगा।

और सचमुच उसने कभी नहीं लिए।

मैंने दो-तीन बार कोशिश की। हर बार वह बात टाल देता। जैसे वह रकम उसके लिए अब महत्वपूर्ण ही न हो।

धीरे-धीरे हम अलग होते गए। मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर से बाहर चला आया। नए लोग, नई जगहें, नौकरी, परिवार — जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। बचपन पीछे छूट गया, जैसे बरसात के बाद मिट जाने वाले पैरों के निशान।

फिर कई वर्षों बाद मैं उस पुराने शहर गया।

बहुत कुछ बदल चुका था।

जहाँ कच्ची सड़क थी वहाँ अब पक्की दुकानें थीं। पान की वह गुमटी भी नहीं थी। उसकी जगह मोबाइल और रिचार्ज की दुकान खुल गई थी।

मैंने आसपास पूछताछ की।

किसी बूढ़े आदमी ने उसे याद किया।

फिर बहुत साधारण ढंग से कहा — “अरे, उसका तो कई साल पहले देहांत हो गया।”

उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे मौसम की कोई सामान्य सूचना दे रहे हों।

लेकिन मेरे भीतर उस क्षण कुछ बहुत धीरे से बैठ गया।

मुझे अचानक उसका चेहरा याद आया। धूल भरे पैर। गिल्ली मारते समय चमकती आँखें। और गुमटी की पीली रोशनी में मेरी तरफ़ बढ़ाए गए आठ आने।

अब सोचता हूँ तो लगता है कि मनुष्य की उदारता का संबंध उसकी हैसियत से नहीं होता। कई बार जिनके पास सबसे कम होता है, वही सबसे सहज ढंग से दे पाते हैं।

वह लड़का शायद अपने जीवन में बहुत दूर नहीं जा सका।

उसका नाम भी अब धीरे-धीरे स्मृति से धुँधला होने लगा है।

लेकिन कुछ दृश्य भीतर स्थायी हो जाते हैं।

आज भी जब किसी मैदान में गिल्ली हवा में उछलती दिखाई देती है, मुझे लगता है कि वह कहीं आसपास ही है — पतला-सा लड़का, धूल में खड़ा, जैसे अभी डंडा घुमाकर फिर से गिल्ली बहुत दूर मार देगा।

मुकेश ,,,,,,,,,

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