समंदर की तह में कोई आवाज़ नहीं पहुँचती
समंदर की एक गहरी तह है,
नीली,
बहुत शांत,
जहाँ ऊपर की दुनिया
सिर्फ़ एक धुँधली हलचल बनकर रह जाती है।
मैं धीरे-धीरे
उस गहराई में उतरा,
और हर क़दम पर
एक आवाज़ पीछे छूटती गई।
पहले लोगों की बातें गईं,
फिर अपने ही ख़याल,
फिर वे सारे प्रश्न
जिन्होंने मुझे बरसों जगाए रखा था।
नीचे पहुँचकर
अजीब सन्नाटा था
ऐसा नहीं
जो डराए,
बल्कि ऐसा
जो भीतर की टूटन को
धीरे-धीरे शांत कर दे।
मैंने वहाँ
अपने दुःख को पुकारना चाहा,
मगर शब्द
पानी में घुल गए।
तब समझ आया,
कुछ गहराइयों में
व्याख्या नहीं उतरती।
वहाँ
इंसान को
अपने अर्थ भी उतारने पड़ते हैं।
मैं देर तक
उसी तह में ठहरा रहा,
जहाँ न कोई शिकायत थी,
न कोई स्मृति
अपने पुराने आकार में बची थी।
और जब ऊपर लौटा,
तो दुनिया वही थी
शोर से भरी,
जल्दी में भागती हुई।
बस मेरे भीतर
अब एक जगह ऐसी थी
जहाँ कोई आवाज़
पूरी तरह पहुँच नहीं सकती थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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