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Monday, 11 May 2026

सन्नाटे में कोई झूठ टिकता नहीं

 सन्नाटे में कोई झूठ टिकता नहीं

सन्नाटे का एक गलियारा है,
लंबा,
ठंडा,
जहाँ क़दमों की आहट भी
अपने आप से डरती है।

मैं वहाँ से गुज़रा
तो महसूस हुआ
कि भीतर बहुत शोर है
अनकहे शब्दों का,
छुपाए हुए डर का,
और उन चेहरों का
जिन्हें मैं बरसों से
अपने भीतर ढोता आया था।

पहले लगा
यह सन्नाटा मुझे तोड़ देगा,
मगर धीरे-धीरे
उसने सिर्फ़ परतें हटानी शुरू कीं।

एक-एक करके
बहाने गिरते गए,
यक़ीन टूटते गए,
और वे सारे झूठ
जिन्हें मैं सच मानकर जीता रहा,
ख़ुद-ब-ख़ुद
कमज़ोर पड़ने लगे।

वहाँ
कोई सवाल नहीं था,
फिर भी
हर चीज़ जवाब बनती जा रही थी।

मैंने पहली बार
अपने भीतर के आदमी को
बिना किसी कहानी के देखा
न अच्छा,
न बुरा,
सिर्फ़ एक थका हुआ सच।

बहुत देर बाद
जब मैं उस गलियारे से बाहर आया,
तो दुनिया वैसी ही थी
लोग, रिश्ते, आवाज़ें,
सब कुछ।

बस अब
मैं जानता था
कि इंसान दुनिया से नहीं,
सबसे ज़्यादा
अपने ही बनाए शोर से छिपता है

MUKESH,,,,,,

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