आदि
शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धान्त की वैदिक आधारभूमि
वेद,
उपनिषद्, प्राचीन आचार्य-परम्परा और शंकरपूर्व अद्वैत-चिन्तन का शोधात्मक अध्ययन
भारतीय
दर्शन के इतिहास में
यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है —
“क्या
शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त
वास्तव में वेदसम्मत है,
या वह बाद की
दार्शनिक रचना है?”
द्वैत,
विशिष्टाद्वैत और अन्य परम्पराओं
के अनेक आचार्यों ने
यह प्रश्न उठाया कि —
- क्या वेद वास्तव में “जीव-ब्रह्म अभेद” सिखाते हैं?
- या शंकराचार्य ने उपनिषदों की विशेष प्रकार से व्याख्या की?
इस प्रश्न का उत्तर केवल
मत-आस्था से नहीं, बल्कि
वैदिक, उपनिषदिक, ब्राह्मण, आरण्यक और प्राचीन वेदान्त-परम्परा के अध्ययन से
दिया जा सकता है।
१.
क्या वेदों में अद्वैत की शिक्षा मिलती है?
संक्षेप
में उत्तर है — हाँ।
किन्तु यह समझना आवश्यक
है कि वेदों में
अद्वैत का विचार मुख्यतः
—
- उपनिषदों,
- आरण्यकों,
- और ऋग्वेद के कुछ दार्शनिक सूक्तों
में
विकसित रूप में मिलता
है।
२.
ऋग्वेद में अद्वैत की प्रारम्भिक झलक
(क)
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”
ऋग्वेद
का प्रसिद्ध मंत्र —
“एकं
सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”
(ऋग्वेद १.१६४.४६)
अर्थ
—
सत्य
एक है, ज्ञानी उसे
अनेक नामों से कहते हैं।
यहाँ
“एकं सत्” की अवधारणा
अद्वैत की बीजभूमि है।
शंकराचार्य
का अद्वैत इसी “एक सत्ता”
को ब्रह्म के रूप में
विकसित करता है।
(ख)
नासदीय सूक्त
ऋग्वेद
का “नासदीय सूक्त” (१०.१२९) अत्यन्त
दार्शनिक है —
“नासदासीन्नो
सदासीत्तदानीम्…”
यहाँ
सृष्टि के पूर्व की
ऐसी स्थिति का वर्णन है
जहाँ —
- न सत् था,
- न असत्,
- न आकाश,
- न मृत्यु,
- न अमरत्व।
यह दृश्य जगत् के पार
किसी अद्वितीय सत्ता की ओर संकेत
है।
३.
उपनिषदों में अद्वैत की स्पष्ट स्थापना
वास्तविक
अद्वैत-दर्शन का परिपक्व स्वरूप
उपनिषदों में मिलता है।
(क)
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
छान्दोग्य
उपनिषद्
“सर्वं
खल्विदं ब्रह्म।”
(छा. उ. ३.१४.१)
अर्थ
—
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही
है।
यह शंकराचार्य के अद्वैत का
प्रत्यक्ष आधार है।
(ख)
“तत्त्वमसि”
उसी
उपनिषद् में —
“तत्त्वमसि
श्वेतकेतो।”
(छा. उ. ६.८.७)
अर्थ
—
“हे
श्वेतकेतु, तू वही ब्रह्म
है।”
यह जीव और ब्रह्म
की अभिन्नता की प्रत्यक्ष घोषणा
है।
(ग)
“अहं ब्रह्मास्मि”
बृहदारण्यक
उपनिषद्
“अहं
ब्रह्मास्मि।”
(बृ. उ. १.४.१०)
यहाँ
व्यक्तिगत आत्मा स्वयं को ब्रह्म रूप
में जानती है।
(घ)
“प्रज्ञानं ब्रह्म”
ऐतरेय
उपनिषद्
“प्रज्ञानं
ब्रह्म।”
अर्थ
—
चेतना
ही ब्रह्म है।
यह अद्वैत का चेतना-दर्शन
है।
(ङ)
“नेह नानास्ति किंचन”
बृहदारण्यक
उपनिषद्
“नेह
नानास्ति किंचन।”
अर्थ
— यहाँ वास्तव में कोई अनेकता
नहीं है।
यह शंकराचार्य के अद्वैत का
सबसे स्पष्ट वैदिक प्रमाणों में से एक
है।
४.
क्या शंकराचार्य पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अद्वैत सिखाया?
नहीं।
यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
तथ्य है।
शंकराचार्य
अद्वैत के “निर्माता” नहीं
थे;
वे उसके महान “व्यवस्थित
व्याख्याता”
(systematizer) थे।
५.
शंकरपूर्व अद्वैत परम्परा
(क)
उपनिषद् ऋषि
सबसे
पहले अद्वैत की अनुभूति उपनिषदों
के ऋषियों में मिलती है
—
- याज्ञवल्क्य
- उद्दालक
- श्वेतकेतु
इन ऋषियों ने आत्मा और
ब्रह्म की एकता का
प्रतिपादन किया।
(ख)
गौड़पादाचार्य
शंकराचार्य
से पूर्व अद्वैत का सबसे व्यवस्थित
दार्शनिक प्रतिपादन गौड़पादाचार्य ने किया।
उनकी
माण्डूक्यकारिका में “अजातिवाद” मिलता
है —
“न कोई उत्पत्ति है,
न विनाश।”
गौड़पादाचार्य
ने स्वप्न और माया के
उदाहरणों से जगत् की
मिथ्यात्व-व्याख्या की।
(ग)
ब्रह्मसूत्र पर प्राचीन भाष्यकार
शंकराचार्य
अपने भाष्यों में कई पूर्ववर्ती
आचार्यों का उल्लेख करते
हैं —
- आश्मरथ्य
- औडुलोमि
- काशकृत्स्न
इनसे
स्पष्ट होता है कि
शंकर से पहले भी
वेदान्त-चिन्तन विकसित था।
६.
शंकराचार्य का वास्तविक योगदान
यदि
अद्वैत पहले से था,
तो शंकराचार्य का महत्त्व क्या
है?
उनका
महत्त्व पाँच कारणों से
है —
(१)
अद्वैत का दार्शनिक प्रणालीकरण
शंकराचार्य
ने पहली बार अद्वैत
को —
- तार्किक,
- दार्शनिक,
- शास्त्रीय,
- और व्यवस्थित रूप दिया।
(२)
उपनिषद्–गीता–ब्रह्मसूत्र का समन्वय
उन्होंने
“प्रस्थानत्रयी” —
- उपनिषद्,
- भगवद्गीता,
- ब्रह्मसूत्र
— पर
भाष्य लिखकर अद्वैत को वेदान्त का
मुख्य स्वरूप सिद्ध किया।
(३)
माया सिद्धान्त की स्पष्टता
उपनिषदों
में “माया” शब्द सीमित रूप
में था।
शंकराचार्य ने उसे दार्शनिक
शक्ति के रूप में
व्यवस्थित किया।
(४)
बौद्ध दर्शन के साथ संवाद
उस समय भारत में
बौद्ध दर्शन अत्यन्त प्रभावशाली था।
शंकराचार्य
ने —
- शून्यवाद,
- विज्ञानवाद,
- और क्षणिकवाद
का तार्किक उत्तर दिया।
(५)
सनातन वैदिक परम्परा का पुनरुत्थान
8वीं
शताब्दी तक वैदिक धर्म
अनेक शाखाओं में विभाजित हो
चुका था।
शंकराचार्य ने चार मठों
की स्थापना कर वैदिक अद्वैत
परम्परा को संगठित किया।
७.
क्या वेद केवल अद्वैत ही सिखाते हैं?
यहाँ
एक सूक्ष्म बात समझनी चाहिए।
वेदों
में —
- कर्म,
- उपासना,
- भक्ति,
- द्वैत,
- और अद्वैत
— सभी
स्तर मिलते हैं।
क्योंकि
वेद मानव-चेतना के
विभिन्न स्तरों को सम्बोधित करते
हैं।
किन्तु
शंकराचार्य कहते हैं —
वेदों
का “परम तात्पर्य” अद्वैत
है।
इसे
वे “उपनिषद्-वाक्यों” के आधार पर
सिद्ध करते हैं।
८.
आधुनिक शोध और अद्वैत
आज अनेक विद्वान यह
मानते हैं कि उपनिषदों
में —
- non-dual
consciousness,
- unified
reality,
- और observer-centered
existence
की अत्यन्त उन्नत अवधारणाएँ हैं।
Sarvepalli Radhakrishnan ने
कहा था —
“उपनिषद्
मानव आत्मा के सबसे साहसी
आध्यात्मिक घोषणापत्र हैं।”
शंकराचार्य
का अद्वैत वेदान्त वेदों से गहराई से
पुष्ट है।
- ऋग्वेद में उसका बीज,
- उपनिषदों में उसका विकास,
- गौड़पाद में उसका दार्शनिक रूप,
- और शंकराचार्य में उसका पूर्ण प्रणालीकरण मिलता है।
अतः
शंकराचार्य अद्वैत के आविष्कारक नहीं,
बल्कि उसके महानतम व्याख्याता
और पुनर्संयोजक हैं।
उनका
सबसे बड़ा योगदान यह
था कि उन्होंने यह
दिखाया —
वेदों
का अंतिम संदेश बाह्य कर्म नहीं,
बल्कि आत्मा और ब्रह्म की
अद्वितीय एकता है।
और यही अद्वैत आज
भी मानव चेतना की
सबसे गहन दार्शनिक सम्भावनाओं
में से एक माना
जाता है।
मुकेश
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