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Friday, 15 May 2026

ईशावास्योपनिषद् का अष्टम मंत्र : शंकरभाष्य, अनुवाद एवं अद्वैत-दृष्टि से दार्शनिक विवेचन

 

ईशावास्योपनिषद् का अष्टम मंत्र : शंकरभाष्य, अनुवाद एवं अद्वैत-दृष्टि से दार्शनिक विवेचन

मूल मंत्र (यथावत)

पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः

शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)

योज्यमतीतैर्मन्त्रैरुक्त आत्मा स्वेन रूपेण किलक्षण इत्याहायं मन्त्रः पर्यगात्। यथोक्त आत्मा पर्यगात्, परि समन्तादगात्, आकाशवद्व्यापीत्यर्थः। शुक्रम्शुद्धं ज्योतिष्मद्दीप्तिमानित्यर्थः। अकायम्अशरीरम्, अलिङ्गशरीरवर्जितमित्यर्थः। अव्रणम्अक्षतम्। अस्नाविरम्स्नावाः शिरा यस्मिन्न विद्यन्त इत्यस्नाविरम्। अव्रणमस्नाविरमित्याभ्यां स्थूलशरीरप्रतिषेधः। शुद्धम्निर्मलम् अविद्यामलरहितमिति कारणशरीरप्रतिषेधः। अपापविद्धम्धर्माधर्मादिपापवर्जितम्। शुक्रमित्यादीनि वचांसि पुंलिङ्गत्वेन परिणेयानि पर्यगात्इत्युपक्रम्यकविर्मनीषीइत्यादिना पुंलिङ्गत्वेनोपसंहारात्। कविःक्रान्तदर्शी।नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’ (बृ. . ३।७।२३) इत्यादिश्रुतेः। मनीषीमनस ईषिता, सर्वज्ञ ईश्वर इत्यर्थः। परिभूःसर्वेषां पर्युपरि भवतीति परिभूः। स्वयंभूःस्वयमेव भवति इति स्वयंभूः। यः सर्वेषामुपरि भवति सर्वः स्वयमेव भवतीति। नित्यमुक्त ईश्वरः याथातथ्यतः सर्वज्ञत्वाद् यथातथाभावो याथातथ्यम्, तस्माद् यथाभूतकर्मफलसाधनतोऽर्थान् कर्तव्यपदार्थान् व्यदधात्, विभजदित्यर्थः। शाश्वतीभ्यःनित्याभ्यः समाभ्यः संवत्सराख्येभ्यः प्रजापतिभ्य इत्यर्थः

मंत्र का हिंदी अनुवाद

वह (परमात्मा) सब ओर व्याप्त है, प्रकाशस्वरूप है, शरीररहित है, छिद्र या घाव से रहित है, स्नायु-शिराओं से रहित है, पूर्णतः शुद्ध है और पाप से अछूता है। वह सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सबके ऊपर स्थित, स्वयंप्रकाश एवं स्वयंभू है। वही सर्वज्ञ ईश्वर यथार्थ रूप से समस्त पदार्थों और उनके कर्मफल-विभाग को शाश्वत कालों तथा प्रजापतियों के लिए व्यवस्थित करता है।

शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)

पूर्ववर्ती मंत्रों में जिस आत्मा का वर्णन किया गया है, यह मंत्र उसी आत्मा के वास्तविक स्वरूप का निरूपण करता है।

पर्यगात्” — वह आत्मा सब ओर व्याप्त है; अर्थात् आकाश के समान सर्वव्यापक है।

शुक्रम्” — वह शुद्ध, प्रकाशमान और तेजस्वी है।

अकायम्” — वह शरीररहित है; यहाँ तक कि सूक्ष्म शरीर से भी रहित है।

अव्रणम्” — उसमें कोई क्षति या छिद्र नहीं है।

अस्नाविरम्” — जिसमें स्नायु अथवा शिराएँ नहीं हैं।

अव्रणम्औरअस्नाविरम्” — इन शब्दों द्वारा स्थूल शरीर का निषेध किया गया है।

शुद्धम्” — वह निर्मल है, अविद्या रूपी मल से रहित है; इससे कारण शरीर का निषेध किया गया है।

अपापविद्धम्” — वह धर्म-अधर्म आदि पापों से सर्वथा रहित है।

शुक्रम्आदि शब्दों को पुल्लिंग में ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि आरम्भ में पर्यगात्और अंत मेंकविः मनीषीआदि पुल्लिंग प्रयोग हैं।

कविः” — सब कुछ देखने वाला, दूरदर्शी।

श्रुति कहती है — “उससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है।

मनीषी” — मन का नियन्ता; अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वर।

परिभूः” — जो सबके ऊपर स्थित है।

स्वयंभूः” — जो स्वयं से ही सिद्ध है, किसी अन्य कारण पर आश्रित नहीं।

जो सबके ऊपर स्थित है, वही स्वयं से सिद्ध है।

वह नित्य-मुक्त ईश्वर अपने सर्वज्ञ स्वरूप के कारण वस्तुओं को यथार्थ रूप में जानकर कर्मों और उनके फलों के अनुसार कर्तव्य पदार्थों का विभाजन करता है।

शाश्वतीभ्यः समाभ्यः” — अर्थात् शाश्वत कालों तथा संवत्सररूप प्रजापतियों के लिए।

 

ईशावास्योपनिषद् के अष्टम मंत्र में निरुपित ब्रह्मस्वरूप : शंकरभाष्य की अद्वैतमीमांसा

ईशावास्योपनिषद् का अष्टम मंत्र उपनिषद् साहित्य में ब्रह्म के निर्गुण-निराकार स्वरूप का अत्यन्त सघन और दार्शनिक निरूपण प्रस्तुत करता है। यदि सातवें मंत्र में अद्वैत के अनुभूत स्वरूप का प्रतिपादन थाजहाँ ज्ञानी समस्त भूतों में आत्मा का दर्शन करता हैतो आठवाँ मंत्र उस आत्मा की तत्त्वतः सत्ता का विश्लेषण करता है।

ईशावास्योपनिषद् पर आदि शंकराचार्य का भाष्य भारतीय दर्शन में अद्वैत वेदान्त की मूल आधारशिला माना जाता है। इस मंत्र में शंकराचार्य केवल ईश्वर का गुणगान नहीं करते, बल्कि एक-एक विशेषण के माध्यम से जीव पर आरोपित समस्त उपाधियों का निषेध करते हैं।

. “ पर्यगात्” — ब्रह्म की सर्वव्यापकता

शंकराचार्यपर्यगात्का अर्थ करते हैं — “आकाशवत् व्याप्त यहाँ आत्मा कोई सीमित सत्ता नहीं, बल्कि सर्वत्र व्यापी चैतन्य है। यह अद्वैत का मूल तत्त्व है कि चेतना शरीर में सीमित नहीं, बल्कि शरीर चेतना में अवस्थित है।

यहाँ उपनिषद् आधुनिक भौतिक अवधारणाओं से भी आगे बढ़कर चेतना को अस्तित्व का मूल आधार घोषित करता है।

. “अकायम्” — शरीरातीत सत्ता

शंकराचार्य अत्यन्त सूक्ष्म ढंग सेअकायम्का अर्थ केवल स्थूल शरीररहित नहीं, बल्किअलिङ्गशरीरवर्जितम्” — सूक्ष्म शरीर से भी रहितकरते हैं।

अद्वैत वेदान्त में तीन शरीर माने गए हैंस्थूल शरीर /सूक्ष्म शरीर /कारण शरीर

यह मंत्र इन तीनों का क्रमशः निषेध करता है।

मंत्र पद

निषेध

अव्रणम्, अस्नाविरम्

स्थूल शरीर

अकायम्

सूक्ष्म शरीर

शुद्धम्

कारण शरीर

इस प्रकार आत्मा किसी भी जैविक, मानसिक या कारणात्मक संरचना से परे सिद्ध होती है।

. “शुद्धम् अपापविद्धम्” — कर्मातीत आत्मा

शंकराचार्यअपापविद्धम्का अर्थ करते हैंधर्म-अधर्म से रहित।

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बिंदु है। अद्वैत के अनुसार कर्म जीव के स्तर पर लागू होते हैं, आत्मा पर नहीं। आत्मा पुण्य से बंधती है, पाप से। यही कारण है कि मुक्त पुरुष कर्म के मध्य रहते हुए भी भीतर से अकर्ता रहता है।

यहाँ गीता के निष्काम कर्मयोग और उपनिषद् के आत्मज्ञान का गहरा सामंजस्य दिखाई देता है।

. “कविः मनीषी” — सर्वज्ञ चेतना

कविशब्द यहाँ काव्यकार नहीं, बल्किक्रान्तदर्शी” — सब कुछ देखने वालाहै।

मनीषीका अर्थ शंकराचार्यमनस ईषिताअर्थात् मन का नियन्ता करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान जहाँ मन को चेतना का आधार मानता है, वहीं उपनिषद् मन को भी आत्मा के अधीन घोषित करता है।

अर्थात् मन देखने वाला नहीं; मन को प्रकाशित करने वाली सत्ता आत्मा है।

. “परिभूः स्वयंभूः” — परम स्वतंत्र सत्ता

स्वयंभूका अर्थ हैजो स्वयं से सिद्ध है, जिसका अस्तित्व किसी अन्य कारण पर निर्भर नहीं।

पाश्चात्य दर्शन में “uncaused cause” की जो धारणा है, उपनिषद् उसे चेतन ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य के अनुसार वही सत्ता सबके ऊपर स्थित है, इसलिए वही परम वास्तविकता है।

. “याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्” — ब्रह्म और विश्व-व्यवस्था

यहाँ उपनिषद् केवल निर्गुण ब्रह्म की चर्चा नहीं करता; वही ब्रह्म ईश्वर रूप में जगत्-व्यवस्था का नियमन भी करता है।

शंकराचार्य कहते हैं कि ईश्वर कर्मों और उनके फलों का यथार्थ विभाजन करता है। यह अद्वैत की अत्यन्त सूक्ष्म विशेषता है
निर्गुण ब्रह्म और सगुण ईश्वर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्ता के दो दृष्टिकोण हैं।

. अद्वैत की पराकाष्ठा

यह मंत्रनेति-नेतिकी उपनिषद् पद्धति का उत्कृष्ट उदाहरण है। आत्मा क्या हैयह बताने से पहले उपनिषद् बताता है कि आत्मा क्या नहीं है।

  • वह शरीर नहीं
  • वह मन नहीं
  • वह कर्म नहीं
  • वह पाप-पुण्य नहीं
  • वह परिवर्तनशील सत्ता नहीं

अन्ततः जो शेष रहता है वही शुद्ध चैतन्य है।

ईशावास्योपनिषद् का अष्टम मंत्र अद्वैत वेदान्त का दार्शनिक घोष है। यहाँ आत्मा को किसी धार्मिक देवता के रूप में नहीं, बल्कि सार्वभौम, निरपेक्ष, सर्वव्यापक चेतना के रूप में निरूपित किया गया है।

आदि शंकराचार्य का भाष्य इस मंत्र को केवल आध्यात्मिक अनुभूति नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक कठोर दार्शनिक प्रणाली में रूपान्तरित कर देता है।

यह मंत्र बताता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नश्वर शरीर नहीं, बल्कि वही शुद्ध, अपापविद्ध, स्वयंभू चेतना है

जो सबमें समान रूप से व्याप्त है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,

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